|
निगम का संगठन तथा शासन
4. नगर निगम का निगमित निकाय होना-
संविधान के भाग
9-क के अनुसार उसके
अनुच्छेद
243-थ के
खण्ड
(1)
के उपखण्ड (ग) के अधीन संगठित किसी नगर निगम को
. . . . . . . . . . . (नगर का नाम) नगर निगम के नाम
से जाना जायगा और वह एक निगमित निगम को . . . . . . . . . . (नगर का नाम) नगर निगम
के नाम से जाना जायगा और वह एक निगमित निकाय होगा।
5.
निगम के प्राधिकारी -
प्रत्येक नगर के लिए इस अधिनियम के उपबन्धों को कार्यान्वित करने हेतु निम्नलिखित
निगम प्राधिकारी उत्तरदायी होंगे-
-
निगम
-
कक्ष समितियाँ,
-
निगम की कार्यकारिणी समिति,
-
नगर प्रमुख ;
-
निगम की विकास समिति,
-
इस अधिनियम के अधीन
निगम के लिये नियुक्त एक मुख्य नगर अधिकारी और एक
अपर मुख्य नगर अधिकारी तथा
-
ऐसी स्थिति में जब
निगम विद्युत-सम्भरण अथवा सार्वजनिक परिवहन
उपक्रम
(electricity supply or public
transport undertaking) अथवा अन्य सार्वजनिक उपयोगी
सेवायें स्थापित अथवा अर्जित करे तो
निगम की ऐसी अन्य समिति अथवा समितियाँ,
जिन्हें निगम राज्य सरकार की पूर्व स्वीकृति से उनके लिए स्थापित करे।
5-क. स्थानीय निकाय निदेशक -
-
राज्य सरकार किसी अधिकारी को स्थानीय निकाय
निदेशक, उत्तर प्रदेश नियुक्त करेगी।,
-
इस अधिनियम के
द्वारा या अधीन अभिव्यक्ततः समनुदेशित कृत्यों के अतिरिक्त निदेशक,
निगम के कार्य-कलापों के सम्बन्ध में, राज्य सरकार के
ऐसे अधिकारों का (जो
द्वारा
538 और
539 के अधीन अधिकारी न हों), जिन्हें राज्य सरकार गजट में अधिसूचना
द्वारा और ऐसी शर्तों तथा निबन्धनों के अधीन
(जिनके अन्तर्गत स्वयं उसके
द्वारा
पुनर्विलोकन की
शर्त भी है) जो ऐसी
अधिसूचना में विनिर्दिष्ट किये जायें, उसे प्रतिनिहित करे, प्रयोग करेगा।
6.
निगम की संरचना -
-
निगम एक नगर प्रमुख और निम्नलिखित से मिलकर बनेगा-
-
सभासद जिनकी संख्या उतनी होगी जितनी राज्य सरकार, सरकारी गजट में विज्ञप्ति
द्वारा
नियत करे, परन्तु जो साठ से अन्यून और एक सौ दस से अनधिक होगी और जो संख्या,
खण्ड (ख) के अधीन नाम-निर्दिष्ट सदस्यों के
अतिरिक्त होगी;
-
नाम-निर्दिष्ट सदस्य जिन्हें राज्य सरकार
द्वारा इसी प्रकार की
विज्ञप्ति
द्वारा उन व्यक्तियों में से, जिन्हें नगरपालिका
प्रशासन का
विशिष्ट ज्ञान या अनुभव हो,
नाम-निर्दिष्ट किया जायेगा और जिनकी संख्या पाँच से अन्यून और दस से अनधिक होगी ;
-
पदेन सदस्य जिसमें लोक सभा और राज्य विधान सभा के वे सदस्य हैं जो
उन निर्वाचन
क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व करते हैं जिनमें नगर
पूर्णतः या भागतः समाविष्ट हैं;
-
पदेन सदस्य जिसमें राज्य सभा और राज्य विधान परिषद के वे सदस्य हैं जो उस नगर
में निर्वाचक के रूप में
रजिस्ट्रीकृत हैं ;
-
द्वारा
5 के खण्ड के अधीन स्थापित समितियों के, यदि कोई
हों, अध्यक्ष, यदि वे निगम के सदस्य नहीं हैं :
किन्तु प्रतिबन्ध यह है कि
खण्ड (ख) में निर्दिष्ट
व्यक्तियों को निगम की बैठकों
में मत देने का अधिकार नहीं होगाः
किन्तु प्रतिबन्ध यह भी है कि
खण्ड (क) से में निर्दिष्ट
श्रेणी के सदस्यों में
किसी रिक्ति से निगम के संगठन या
पुर्नसंगठन में कोई बाधा नहीं पड़ेगी।
(2) सभासद कक्षों से प्रत्यक्ष
निर्वाचन
द्वारा चुने जायेंगे।,
6-क. कक्ष समितियों का
संगठन और संरचना-
-
तीन लाख या उससे अधिक जनसंख्या
वाले निगम के प्रादेशिक क्षेत्र के भीतर संविधान के अनुच्छेद
243-थ के
खण्ड (1)
के अधीन संगठित प्रत्येक
कक्ष समिति में दस
कक्ष होंगे।
-
कक्ष समिति का
प्रादेशिक क्षेत्र उस समिति में समाविष्ट कक्षों के
प्रादेशिक क्षेत्रों से मिलकर बनेगा।
-
प्रत्येक कक्ष समिति में निम्नलिखित होंगेः
-
कक्ष समिति के
प्रादेशिक क्षेत्र के भीतर कक्षों का प्रतिनिधित्व करने वाले सभी
सभासद;
-
पाँच से अनधिक
ऐसे अन्य सदस्य जो राज्य सरकार
द्वारा सम्बद्ध
कक्ष समिति के
प्रादेशिक क्षेत्र के भीतर निवरचकों के रूप में
रजिस्ट्रीकृत व्यक्तियों में से,
जिन्हें नगरपालिका
प्रशासन का विशेष ज्ञान
या अनुभव हो नाम-निर्दिष्ट किये जायेंगे।
-
कक्ष समिति अपने
संगठन के पश्चात अपनी प्रथम बैठक में और प्रत्येक
उत्तरवरती वर्ष में उसी मास में अपनी प्रथम बैठक
में उपधारा
(3) के खण्ड (क) में उल्लिखित
सदस्यों में से एक को समिति के अध्यक्ष के रूप में
निर्वाचित करेगी।
-
अध्यक्ष के पद का कार्यकाल एक वर्ष होगा, किन्तु वह अपना उत्तराधिकारी चुने
जाने तक पद धारण करेगा और पुनर्निवाचन के लिये पात्र होगा।
-
सभासद न रह जाने पर अध्यक्ष तुरन्त अपना पद
रिक्त कर देगा।
-
कक्ष समिति का कार्यकाल निगम की अवधि के साथ समाप्त होगा।
-
इस अधिनियम के उपबन्धों के अधीन रहते हुये
कक्ष समिति
ऐसी
शक्तियों का प्रयोग
और ऐसे कृत्यों का निर्वहन करेगी जो नियमों
द्वारा विहित किये जायें।,
7. स्थानों
का आरक्षण-
-
प्रत्येक निगम में अनुसूचित जातियों,
अनुसूचित जनजातियों और पिछ्ड़े
वर्गों, के लिये स्थान आरक्षित किये जायेंगे और इस
प्रकार आरक्षित स्थानों की संख्या का अनुपात निगम में प्रत्यक्ष चुनाव से भरे जाने वाले कुल स्थानों की संख्या में
यथाशक्य, वही होगा जो नगरपालिका
क्षेत्र में अनुसूचित जातियों की या नगरपालिका
क्षेत्र
में अनुसूचित जनजातियों की नगरपालिका
क्षेत्र में पिछ्ड़े वर्गों, की
जनसंख्या का अनुपात
ऐसे क्षेत्र की कुल जनसंख्या में हो और
ऐसे स्थान किसी निगम के
विभिन्न कक्षों में
ऐसे क्रम में
चक्रानु क्रम में आवंटित किये जायेंगे जैसा नियमों
द्वारा
विहित किया जाय:
किन्तु प्रतिबन्ध यह है, कि किसी निगम में पिछ्ड़े
वर्गों के लिये आरक्षण कुल
स्थानों की संख्या के सत्ताइस प्रतिशत से अधिक नहीं होगाः
किन्तु अग्रतर प्रतिबन्ध यह है कि यदि पिछ्ड़े
वर्गों की जनसंख्या के आंकड़े उपलब्ध
न हों तो नियमों
द्वारा विहित रीति से
सर्वेक्षण करके उनकी जनसंख्या अवधारित की जा सकती है।
-
[*
* * * *]
-
उपधारा
(1) के अधीन आरक्षित स्थानों के एक तिहाई से अन्यून स्थान
यथास्थिति, अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों या पिछ्ड़े
वर्गों की स्त्रियों के
लिये आरक्षित रहेंगे।
-
उपधारा (3) के अधीन आरक्षित स्थानों को सम्मिलित करते हुए किसी निगम में
प्रत्यक्ष निर्वाचन से भरे जायेंगे से भरे जाने वाले कुल स्थानों की संख्या के एक
तिहाई से अन्यून स्थान
स्त्रियों के लिये आरक्षित रहेंगे और
ऐसे स्थान किसी निगम
के विभिन्न कक्षों को
ऐसे क्रम में
चक्रानुक्रम में आवंटित किये जायेंगे जैसा नियमों
द्वारा
विहित किया जाय।
-
राज्य में निगमों के नगर प्रमुखों के पद अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों
और पिछ्ड़े वर्गों और
स्त्रियों के लिये ऐसी रीति में आरक्षित किये जायेंगे जो
नियमों द्वारा विहित की जाय।
-
अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिये इस
द्वारा के अधीन स्थानों और
पदों का आरक्षण संविधान के अनुच्छेद
334 में विनिर्दिष्ट अवधि की समाप्ति पर
प्रभावी नहीं रहेगा।
-
स्पष्टीकरण-
यह स्पष्ट किया जाता है कि इस
द्वारा में कोई बात अनुसूचित जातियों,
अनुसूचित जनजातियों, पिछ्ड़े
वर्गों और स्त्रियों को अनारक्षित स्थानों और पदों के
लिये निर्वाचन लड़ने से निर्वाचित नहीं करेगी।,
निगम का कार्यकाल-
-
कोई निगम जब तक कि उसे
द्वारा
538 के अधीन पहले
ही विघटित न कर दिया जाय, अपनी प्रथम बैठक के लिये नियत दिनांक के
5
वर्ष तक, न कि
उससे अधिक, बना रहेगा।
-
किसी निगम के
संगठन के लिये
निर्वाचन-
(क) उपधारा (1) में विनिर्दिष्ट, उसके कार्यकाल की समाप्ति के पूर्व ;
(ख) द्वारा
538
के अधीन उसके विघटन के आदेश के दिनांक से छः मास की अवधि की
समाप्ति के पूर्व;
पूरा कराया जायगाः
किन्तु प्रतिबन्ध यह है कि जहाँ विघटित निगम की
शेष अवधि, जब तक कि निगम बनी रह
सकती थी, छ: मास से कम हो, वहाँ
ऐसी अवधि के लिये निगम का
संगठन करने के लिये
कोई निर्वाचन कराना आवश्यक न होगा।
-
किसी निगम के कार्यकाल की समाप्ति के पूर्व उसके विघटन पर संगठित किया गया निगम
उस अवधि के केवल शेष भाग के लिये, जिस अवधि तक विघटित निगम, उपधारा
(1) के
अधीन बना रहता, यदि उसे इस प्रकार विघटित न किया जाता, बना रहेगा।,
7-क.
[*
* * * *]
8-क. निगम के गठन के लिए और नगर के रूप में अधिसूचित
क्षेत्र के
प्रशासक के लिए अस्थायी उपबन्ध,-(1)
जहाँ किसी क्षेत्र को संविधान के
अनुच्छेद
243-थ के
खण्ड
(2) के अधीन वृहत्तर नगरीय
क्षेत्र विनिर्दिष्ट किया गया
है, और राज्य सरकार की राय है कि
संविधान के अधीन,
ऐसे क्षेत्र के लिए
3निगम का सम्यक संगठन होने तक
ऐसा करना समाचीन
है, वहाँ राज्य सरकार, इस अधिनियम या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में किसी बात
के होते हुए भी आदेश द्वारा
निर्देश दे सकती है कि -
-
ऐसे क्षेत्र में अधिकारिक का प्रयोग करने के लिए
संगठित नगरपालिका, या
कोई अन्य स्थानीय प्राधिकारी,
ऐसे दिनांक से, जैसा
उक्त आदेश में विनिर्दिष्ट
किया जाय, जिसे आगे इस
द्वारा में विनिर्दिष्ट दिनांक कहा गया है, यथास्थिति, विघटित
हो जायेगा या ऐसे
क्षेत्र में अधिकारिता का प्रयोग नहीं करेगा ;
-
निगम उसके नगर प्रमुख, उपनगर प्रमुख,
कक्ष समिति, कार्यकारिणी
समिति, विकास समिति और
द्वारा
5 के
खण्ड (ङ) के अधीन स्थापित अन्य समितियों की और
मुख्य नगर अधिकारी की समस्त
शक्तियाँ, कृत्य और कर्तव्य विनिर्दिष्ट दिनांक से
राज्य सरकार द्वारा इस
निर्मित्त नियुक्त अधिकारी में
(जिसे आगे प्राशासक कहा गया है)
निहित हो जायेंगे और उसके
द्वारा उनका प्रयोग, अनुपालन और निर्वहन किया जायेगा और
प्रशासक को विधि की
दृष्टि से
कक्ष समिति, कार्यकारिणी समिति, विकास समिति या
अन्य समिति या मुख्य नगराधिकारी, जैसा भी अवसर के अनुसार अपेक्षित हो, समझा जाएगा ;
-
प्रशासक को
ऐसे वेतन और भत्ते, जो राज्य सरकार के साधारण या विशेष आदेशों
द्वारा इस निर्मित्त नियत किये जायँ, निगम की निधि से दिये जायेंगे।
-
प्रशासक, राज्य सरकार के किन्हीं साधारण या विशेष आदेशों के अधीन रहते हुए
यदि खण्ड (ख) द्वारा उसे प्रदत्त
शक्तियों में से सब या किन्हीं के बारे में-
(एक) उस निर्मित्त विनिर्दिष्ट रीति से
संगठित ऐसी समिति या अन्य निकाय से, यदि
कोई हो, परामर्श कर सकेगा, या
(दो) इस प्रकार प्रदत्त
शक्तियों को, ऐसी शर्तों के अधीन रहते हुए,
जिन्हें अधिरोपित करना वह उचित समझे, उसके
द्वारा उस निर्मित्त विनिर्दिष्ट किसी
व्यक्ति
को या उपखण्ड (क) के अधीन गठित किसी समिति या अन्य निकाय को प्रत्यायोजित कर सकेगा।
-
इस द्वारा के उपबन्ध
द्वारा
579
और
570
में दिये गये उपबन्धों के
अतिरिक्त होंगे, न
कि उनका अल्पीकरण करेंगे।
9. निगम के संगठन की
विज्ञप्ति -
किसी नगर निगम के लिए सभासदों तथा
नगर-प्रमुख के
निर्वाचन पूरे हो जाने के
पश्चात यथाशीघ्र राज्य सरकार, सरकारी गजट
में विज्ञप्ति प्रकाशित करेगी कि उक्त नगर की
3निगम यथावत
संगठित हो गयी है।
नगर प्रमुख तथा उपनगर प्रमुख
10.
उपनगर-प्रमुख -
-
प्रत्येक निगम के लिए एक उपनगर प्रमुख होगा।
-
यदि कभी नगर प्रमुख किसी कारणवश कार्य करने में असमर्थ हो अथवा नगर-प्रमुख का
पद रिक्त हुआ हो, इस पद के समस्त कर्तव्यों का पालन यथास्थिति नगर-प्रमुख के पुनः
कार्यभार सम्भालने अथवा
रिक्त स्थानों की पूर्ति होने तक उपनगर-प्रमुख करेगा।
11. नगर-प्रमुख तथा उपनगर-प्रमुख के पद के लिए
निर्वाचन की अर्हताएँ-
-
कोई
भी व्यक्ति नगर-प्रमुख के पद पर निर्वाचन के लिए अर्ह न होगा -
-
यदि वह नगर में निर्वाचक नहीं है,
-
यदि उसकी आयु तीस
वर्ष की नहीं हो गई है,
-
यदि वह द्वारा
25
की उपधारा
(1) के अधीन सभासद के रूप में
निर्वाचित
होने के निर्मित्त अर्ह है, अथवा
-
यदि वह सभासद के किसी स्थान के लिए
निर्वाचन में हार चुका हो और उस
निर्वाचन
का फल घोषित होने के दिनांक के
पश्चात छ: महीने व्यतीत न हो गये हों।
-
[*
* * * *]
-
कोई व्यक्ति जो निगम का
सभासद, नहीं है, उपनगर-प्रमुख के पद पर
निर्वाचन
के
43-ए के लिए पात्र न होगा।
11-क. नगर-प्रमुख का
निर्वाचन -
-
नगर-प्रमुख का
निर्वाचन नगर में निर्वाचकों
द्वारा वयस्क मताधिकार के आधार पर होगा।
-
द्वारा 16
में यथाउल्लिखित के सिवाय अपने पद से हटने वाला नगर-प्रमुख
पुनर्निवाचन के लिये पात्र होगा।
-
किसी सभासद के
निर्वाचन के सम्बन्ध में इस अधिनियम के उपबन्धों और तदधीन बनाये
गये नियमों के अधीन
(जिसके अन्तर्गत
निर्वाचन तथा निर्वाचन अपराध से सम्बन्धित विवाद भी
हैं) नगर-प्रमुख के
निर्वाचन के सम्बन्ध में यथावश्यक परिवर्तनों सहित लागू होंगे।
-
यदि किसी सामान्य
निर्वाचन में कोई व्यक्ति नगर-प्रमुख और सभासद दोनों रूप में
या किसी उप चुनाव में सभासद के रूप में या किसी उप चुनाव में सभासद के रूप में होने
पर नगर-प्रमुख
निर्वाचित होता है, तो वह नगर-प्रमुख के रूप में अपने
निर्वाचन के दिनांक
से सभासद नहीं रह जायेगा।,
12.
उपनगर-प्रमुख का निर्वाचन -
-
उपनगर प्रमुख, यथास्थिति,
सभासदों का निर्वाचन पूरा हो जाने के
पश्चात या नगर प्रमुख की पदावधि समाप्त हो जाने
के पश्चात, यथाशक्य शीघ्र
निर्वाचित किया जायेगा।
-
[*
* * * *]
-
उपनगर-प्रमुख सदस्यों
द्वारा अनुपाती प्रतिनिधि पद्धति के अनुसार एकल संमणीय
मत द्वारा निर्वाचित किये जायेंगे और
ऐसे निर्वाचन में मतदान गूढ़
श्लाका
द्वारा होगा।
-
यदि उपनगर-प्रमुख, नगर प्रमुख के पद पर
निर्वाचित हो गया हो तो उपनगर-प्रमुख के
पद की रिक्ति उस दिनांक से होगी, जब से वह नगर-प्रमुख का पद ग्रहण करें।
-
द्वारा
47
के उपबन्ध यथासम्भव उपनगर प्रमुख के
निर्वाचन के सम्बन्ध में
लागू होंगे।
13. सभासदों का
निर्वाचन कब पूर्ण समझा जायेगा-
उपनगर-प्रमुख के
निर्वाचन के प्रयोजन के
निर्मित्त सभासदों का
निर्वाचन किसी स्थान के अपूरित रहने पर भी,
पूर्ण समझा जायेगा यदि
द्वार 6 के अधीन
निश्चित सभासदों की कुल
जनसंख्या की कम से कम चतुष्पंचमांश
(four-fifths)
संख्या पूरी हो गई हो।
14. नगर-प्रमुख अथवा उपनगर-प्रमुख के पदों की
आकस्मिक
रिक्ति-
यदि नगर-प्रमुख तथा
उपनगर-प्रमुख की मृत्यु अथवा उनके पद-त्याग अथवा अन्य किसी कारण से उनके पद
रिक्त हो
जायें तो यथास्थिति नगर-प्रमुख अथवा उपनगर-प्रमुख का
निर्वाचन तत्पश्चात यथाशीघ्र
द्वारा
11-क में या, यथास्थिति
द्वारा
12 में, उपबंधित रीति से होगाः
किन्तु प्रतिबन्ध यह है कि यदि
ऐसी
शेष पदावधि दो महीने अथवा उससे कम की है तो
रिक्ति की पूर्ति नहीं की जायगी जब तक कि निगम अन्यथा संकल्प न करे।
15. नगर-प्रमुख तथा उपनगर-प्रमुख की पदावधि -
-
इस अधिनियम में अन्यथा
उपबन्धित के सिवाय-
(क) नगर प्रमुख की पदावधि निगम के कार्यकाल के साथ-साथ समाप्त होगी ;
(ख) उप नगर प्रमुख की पदावधि उसके
निर्वाचन के दिनांक से एक
वर्ष या सभासद के रूप में उसके पद के शेष कार्यकाल के लिये, जो भी कम हो, होगी।
-
किसी आकस्मिक पद की पूर्ति के
निर्मित्त
निर्वाचित नगर-प्रमुख अथवा उपनगर-प्रमुख
की पदावधि उसके पूर्वाधिकारी की
शेष पदावधि तक के लिए ही होगी ;
-
नगर-प्रमुख अथवा उपनगर-प्रमुख, जब तक कि वह अपना पदत्याग नहीं कर देता अथवा
उसका अर्ह होना समाप्त नहीं हो जाता अथवा वह अनर्ह नहीं हो जाता, उस समय तक अपने पद
पर बना रहेगा जब तक कि उसका उत्तराधिकारी नगर प्रमुख अथवा उपनगर प्रमुख जैसी स्थिति
हो, के पद को ग्रहण नहीं करता।
15.
[*
* * * *]
16. नगर-प्रमुख के
विरूद्ध अविश्वास का प्रस्ताव -
-
नगर प्रमुख
के विरूद्ध अविश्वास प्रकट करने का प्रस्ताव केवल इस
द्वारा में उल्लिखित
प्रक्रिया के
अनुसार ही प्रस्तुत किया जायगा।
-
नगर प्रमुख के पद ग्रहण करने से दो
वर्ष के भीतर इस
द्वारा के अधीन
अविश्वास के किसी प्रस्ताव की नोटिस प्राप्त नहीं की जायेगी।
-
नगर-प्रमुख में अविश्वास
का प्रस्ताव प्रस्तुत करने के मन्तव्य का लिखित तथा निगम के कुल सदस्यों की संख्या के आधे से, न्यून न हो,
हस्ताक्षरित नोटिस, प्रस्तावित प्रस्ताव की एक प्रति सहित हस्ताक्षरकत्तर सदस्यों में से किन्हीं दो सदस्यों
द्वारा उस डिवीजन के
कमिश्नर को दिया जायगा, जिसमें कि
सम्बद्ध नगर स्थित हो।
-
डिवीजन का कमिश्नर इस प्रस्ताव पर विचार प्रकट करने के
निर्मित्त एक अधिवेशन संयोजित करेगा जो उस दिनांक तथा समय पर होगा जिसे कि वह नियत
करे और जो उस दिनांक से, जिस पर उपधारा
(3) के अधीन उसे नोटिस दिया गया था,
30
दिन से पहले तथा
35
दिन
के बाद न होगा। वह अधिवेशन के दिनांक से कम से कम सात
स्पष्ट दिवस पूर्व निगम के प्रत्येक सदस्य निवास-स्थान पर
ऐसे अधिवेशन तथा तदर्थ नियत
दिनांक एवं समय का नोटिस भेजेगा तथा साथ ही साथ उस नोटिस को
ऐसी रीति से प्रकाशित
करवायेगा जिसे वह उचित समझे। तत्पश्चात प्रत्येक सदस्य के सम्बन्ध में यह समझा
जायगा कि उसे नोटिस प्राप्त हो गयी है।
-
जिला न्यायाधीश इस
द्वारा के अधीन संयोजित अधिवेशन की अध्यक्षता करेगा
तथा कोई और व्यक्ति अधिवेशन की अध्यक्षता न कर सकेगा। यदि अधिवेशन के लिये नियत
समय से आधे घंटे के भीतर
जिला न्यायाधीश अध्यक्षता करने के लिये उपस्थित न हो
तो अधिवेशन उस दिनांक और उस समय तक के लिये स्थगित हो जायेगा जिसे उपधारा
(9) के
अधीन जिला न्यायाधीश नियत करेगा।
-
यदि जिला न्यायाधीश अधिवेशन की अध्यक्षता करने में असमर्थ
हो तो वह तत्सम्बन्धी अपने कारणों को अभिलिखित करने के पश्चात उस किसी अन्य दिनांक
और समय के लिये स्थगित कर सकता है जिसे वह निश्चय करे। किन्तु यह दिनांक
उपधारा
(4) के अधीन अधिवेशन के लिये नियत दिनांक से पन्द्रह दिन से अधिक न होगा। वह
अविलम्ब ही डिवीजन के कमिश्नर को अधिवेशन के स्थगन की सूचना देगा। यह आवश्यक नहीं
है कि स्थगित अधिवेशन के सम्बन्ध में दिनांक और समय की सूचना सदस्यों को धचिअताशः
दी जाय, किन्तु डिवीजन का कमिश्नर और उपधारा (4) में व्यवस्थित रीति के अनुसार
स्थगति अधिवेशन के दिनांक और समय की नोटिस का प्रकाशन करेगा।
-
[*
* * * *]
-
उपधारा
(5)
और (6), में की गयी व्यवस्था को छेड़कर इस
द्वारा के अधीन
प्रस्ताव पर विचार करने के प्रयोजन से संयोजित कोई भी अधिवेशन किसी अन्य कारणवाश
स्थगित नहीं किया जायेगा।
-
इस द्वारा के अधीन संयोजित अधिवेशन के प्रारम्भ होते ही
2
जिला न्यायाधीश, उपस्थित सदस्यों के समक्ष उस प्रस्ताव को पढक़ेगा जिस पर विचार करने
के लिये अधिवेशन संयोजित किया गया हो तथा उस प्रस्ताव को वाद-विवाद के निर्मित्त
प्रस्तुत घोषित करेगा।
-
इस द्वारा के अधीन किसी भी प्रस्ताव पर वाद-विवाद स्थगित न किया जायेगा।
-
ऐसा वाद-विवाद, जब तक कि वह पहले ही न समाप्त हो जाय, अधिवेशन आरम्भ होने
के निर्मित्त नियत समय से तीन घंटों की समाप्ति पर स्वतः समाप्त हो जायेगा। यथास्थिति
वाद-विवाद की समाप्ति अथवा उक्त तीन घंटों की समाप्ति पर यह प्रस्ताव
निगम के
समक्ष मतदान के
निर्मित्त प्रस्तुत किया जायगा।
-
जिला न्यायाधीश, न तो प्रस्ताव के गुण-दोषों पर भाषण दे सकेगा और न उसे
उस पर मत देने का अधिकार होगा।
-
अधिवेशन समाप्त होने के
पश्चात जिला न्यायाधीश, अधिवेशन के
कार्य-विवरण की एक प्रति, प्रस्ताव व उस पर मतदान के फल की एक प्रति के सहित तुरन्त
नगर-प्रमुख तथा
डिवीजन के कमिश्नर के पास अग्रसारित करेगा।
-
उपधारा
(13) में उल्लिखित प्रतियों के प्राप्त होने के
पश्चात तीन दिन के
बाद यथाशीघ्र
डिवीजन का कमिश्नर अविश्वास का प्रस्ताव पारित हो जाने की
दशा
में इस आख्या के सहित कि नगर-प्रमुख ने
द्वारा
19
के साथ पठित
उपधारा
(17) के
उपबन्धों के अनुसार त्याग-पत्र अग्रसारित किया है या नहीं, उन प्रतियों को राज्य
सरकार के पास भेज देगा।
-
प्रस्ताव तभी सफल समझा जायेगा जब कि वह निगम के कुल सदस्यों की
दो-तिहाई बहुमत
द्वारा पारित किया गया हो।
-
यदि प्रस्ताव उपर्युक्तत प्रकार से सफल न हो अथवा गणपूर्ति जो कि तत्समय
निगम के सदस्यों की कुल संख्या के दो तिहाई से अन्यून होगा के अभाववाश अधिवेशन
ही न हो सके, तो अधिवेशन के दिनांक से दो
वर्ष की अवधि समाप्त होने तक उसी नगर
प्रमुख में अविश्वास के किसी
पश्चातवर्ती प्रस्ताव
का नोटिस स्वीकार नहीं किया जायेगा ;
-
इस द्वारा के अनुसार नगर-प्रमुख के सम्बन्ध में अविश्वास का प्रस्ताव
पारित और संदिष्ट होने पर उपनगर प्रमुख--
(क) ऐसा संदेश पाने के तीन दिन के भीतर अपना पदत्याग देगा,
तथा
(ख) ऐसे संदेश के पाने से तीन दिन की अवधि की समाप्ति पर नगर प्रमुख के
रूप में काम करना रोक देगा।
-
उपधारा
(17) के खंड (क) के अनुसार नगर प्रमुख के उस उपधारा में मिली
हुई अवधि के भीतर कार्य करने में असफल रहने पर, राज्य सरकार
आज्ञा में
निर्दिष्ट
दिनांक से उसे हटा देगी तथा इस प्रकार हटाया गया कोई
व्यक्ति इस अधिनियम में अन्यत्र
कहीं कोई बात होने पर भी अनुगामी सामान्य
निर्वाचनों से पूर्व होने वाली किसी
आकस्मिक रिक्ति की पूर्ति के लिये पुनः
निर्वाचित होने के लिये पात्र न होगा।
-
[*
* * * *]
-
[*
* * * *]
-
[*
* * * *]
-
[*
* * * *]
-
इस द्वारा के उपबन्धों के अधीन
3
निगम के किसी सदस्य,
डिवीजन के कमिश्नर
जिला न्यायाधीश, अथवा राज्य सरकार
द्वारा की गई किसी बात के सम्बन्ध में किसी भी
न्यायालय में कोई प्राश्न नहीं किया जायेगा।
टिप्पणियाँ
अविश्वास साधारण अनुक्रम में
निर्वाचित किसी व्यक्ति को अथवा
आकस्मिक
रिक्ति में नियुक्त
किये गये किसी
व्यक्ति को भी अविश्वास के मत
द्वारा हटाया जा सकता है। अपवर्जन किसी
प्रकार का विभेद नहीं करता।
हाजी अब्दुल कयूम बनाम केशव
शरण ए०आई०आर०1964
इला०368.
अनुसरण की जाने वाली प्रक्रिया-
नगर पालिका अधिनियम के अधीन सभापति से हटाये जाने की
प्रक्रिया
को आज्ञापालक (mandatory)
धारण किया गया।
महेश चन्द्र बनाम ताराचन्द्र
मोदी, ए०आई०आर०
1958 इला०
72
(पूर्ण पीठ),
प्रस्ताव- ''प्रस्ताव''
शब्द को मात्र एक प्रस्थापना माना गया। प्रस्ताव की एक प्रति
भेजी जाती हैं।
महेश चन्द्र बनाम ताराचन्द्र मोदी, ए०आई०आर०
1958 इला०
374
(पूर्ण पीठ) द्वारा में दी गयी प्रस्ताव की
प्रक्रिया का अनुसरण किया ही जाना होगा।
अब्दुल अलीम खाँ बनाम उ०प्र० सरकार,
1967 ए०एल०जे०
942
अविश्वास के प्रस्ताव
के सम्बन्ध में होने वाली
प्रक्रिया का कड़ाई से अनुसरण किया जाना होगा। ख्गुलाम
महीउद्दीन बनाम मुन्सिफ एटा, ए०आई०आर०
1961 इला०
2001 अनर्ह हो गये सदस्य भी
अविश्वास के प्रस्ताव के नोटिस पर हस्ताक्षर कर सकते हैं। ख्मूलचन्द्र शमर बनाम
उत्तर प्रदेश राज्य,
1962 ए०एल०जे०
381.
अवधि- उत्तर प्रदेश नगर निगम अधिनियम की
द्वारा
16(4) के अधीन विहित की गयी अवधि का
अनुसरण करना ही होगा। ''30 दिनों से पहले तथा
35
दिन के बाद पद का निर्वचन करते हुए
उच्चतम न्यायालय ने यह धारण किया कि यह प्राविधान गणना किये जाने से
30 दिन को अलग
नहीं करता जय चरण लाल अमल बनाम उ०प्र० राज्य,
1967 ए०एल०जे०
936 परिसीमा के
लिये यह कहा गया कि वह नोटिस के भेजने की तारीख से चलेगी।
आस्थगन-
बैठक की अध्यक्षता करने वाला न्यायिक अधिकारी
बैठक को आस्थगित कर सकता है।
ऐसा आस्थगन या स्थगन पहले से भी किया जा सकता है।
जयचरण लाल अमल बनाम उ०प्र०
राज्य,
1967 ए०एल०जे०
936 ;
संसूचना-
तीनों ही चीजें, कार्यवृत्त की प्रति, नोटिस की प्रति तथा मतदान का परिणाम, एक ही
संसूचना (Communication) में भेजी जा सकेगी
महेश चन्द्र बनाम तारा
चन्द्र मोदी, ए०आई०आर०
1958 इला०
374,
17. नगर-प्रमुख सदस्य होगा-
-
नगर प्रमुख, निगम का पदेन सदस्य होगा।
-
निगम अथवा उसका किसी समिति के अधिवेशनों की
अध्यक्षता करते समय नगर-प्रमुख मतों की समानता
(equality of votes) की
दशा में एक निर्णायक
मत (casting vote)
देने का अधिकारी होगा परन्तु सदस्य के रूप में उसे मत देने का अधिकार न होगा।
18. नगर-प्रमुख के भत्ते
-
नगर प्रमुख तथा उपनगर-प्रमुख को
ऐसे भत्ते या
सुविधाएँ, जो निगम राज्य सरकार के पूर्वानुमोदन से निश्चित करे, दी जा सकती
हैं।,
19. नगर-प्रमुख तथा उपनगर-प्रमुख का त्याग-पत्र-
-
यदि नगर प्रमुख अपना पद त्याग
करना चाहे तो वह अपने हस्ताक्षर सहित लेख
द्वारा, जो राज्य सरकार को सम्बोधित होगा,
ऐसा कर सकता है, और यह त्याग-पत्र उस दिनांक से प्रभावी होगा जिस दिन यह सूचना कि
उसका त्याग-पत्र राज्य सरकार
द्वारा स्वीकार कर लिया गया है, मुख्य नगराधिकारी को
प्राप्त हो।
-
उपनगर-प्रमुख किसी भी समय अपने हस्ताक्षर सहित लेख
द्वारा, जो नगर-प्रमुख को
सम्बोधित होगा, अपना पद त्याग कर सकता है और यह त्याग-पत्र नगर-प्रमुख को मिलते ही
प्रभावी हो जायगा।
निगम के सदस्य
20.
[*
* * * *]
21.
[*
* * * *]
22.
[*
* * * *]
23. सभासदों पर प्रयोज्य कतिपय उपबन्ध नाम-निर्दिष्ट सदस्यों पर लागू होंगे-
द्वारा
24,
25,
26,
28,
29,
30-क,
81,
82,
83,
85,
87,
538,
565,
570 और
572 के
उपबन्ध जैसे सभासदों पर लागू होते हैं,
वैसे नामनिर्दिष्ट सदस्यों पर, यथावाश्यक परिवर्तन सहित लागू
होंगे।
24. सभासद के निर्वाचन के लिये अर्हतायें-
कोई
व्यक्ति सभासद के रूप में चुने
जाने के लिये और सभासद होने के लिये तब तक अर्ह नहीं होगा जब तक कि वह
(क) नगर का निर्वाचक न हो ;
(ख) 21
वर्ष की आयु प्राप्त न कर चुका हो, तथा
(ग) स्थान के अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों, पिछ्ड़े
वर्गों या स्त्रियों के
लिये आरक्षित होने की
दशा में, जैसी भी स्थिति हो, सम्बन्धित
श्रेणी का नहीं है।,
25. सभासदों की अनर्हताएँ-
-
कोई भी
व्यक्ति, इस बात के होते हुए भी कि
वह अन्यथा अर्ह है,
सभासद, चुने जाने तथा होने के लिए अनर्ह होगा, यदि
-
उसे इस अधिनियम के आरम्भ से पूर्व अथवा
पश्चात भारत के किसी न्यायालय
द्वारा
किसी अपराध का दोषी पाया गया हो, तथा उसे दो
वर्ष से अन्यून अवधि के लिए कारावास
का दंड् दिया गया हो, जब तक कि उसके
छूटने के दिनांक से पाँच
वर्ष की अवधि या
इससे कम ऐसी अवधि, जिसकी अनुमति राज्य सरकार किसी विशेष मामले में दे, व्यतीत न
हो गई हो;
-
वह अनुन्मुक्त दिवालिया हो ;
-
वह निगम में लाभ के किसी पद पर हो,
-
वह राज्य सरकार अथवा केन्द्रीय सरकार अथवा अन्य किसी स्थानीय प्राधिकारी की
सेवा में हो, अथवा
डिस्टक्ट गवर्नमेन्ट कौंसिल अथवा
अतिरिक्त या सहायक
डिस्टक्ट
गवर्नमेन्ट कौंसिल अथवा अवैतनिक
मजिस्ट्रेट अथवा अवैतनिक मुन्सिफ अथवा अवैतनिक
असिस्टेन्ट कलेक्टर हो ;
-
वह चाहे स्वयं, चाहे उसके लिए न्यासी के रूप में अथवा उसके लाभ के लिए या के
लेखे में किसी
व्यक्ति द्वारा निगम को माल सम्भारित करने के लिए या किसी निर्माण-कार्य के निष्पादन के लिए किन्हीं सेवाओं को, जिनका भार
निगम ने अपने पर
लिया हो, सम्पन्न करने के लिए किये गये किसी संविदे में कोई हिस्सा
या
हित रखता हो;
-
वह निगम को देय ऐसे कर के जिन पर
द्वारा
504
लागू होती है अथवा
ऐसे मूल्य
के, जो नियम
द्वारा दिये गये पानी के लिये देय हो एक
वर्ष से अधिक अवधि के बकाये
का देनदार हो;
-
यदि वह भारत सरकार अथवा किसी राज्य सरकार के अधीन कोई पद ग्रहण करके
भ्रष्टाचार अथवा राजद्रोह के लिए पदच्युत हो चुका हो, जब तक कि उसके पदच्युत होने
के दिनांक छ:
वर्ष
की अवधि न व्यतीत हो गयी हो ;
-
वह किसी सक्षम प्राधिकारी की
आज्ञा से वकालत करने के लिये विवर्जित कर दिया गया
है ;
-
वह इस अधिनियम की
द्वारा
80 तथा
83 के अधीन निगम का सदस्य होने के लिये
अनर्ह है ;
-
वह किसी ऐसे संसर्गजन्य रोगों में से किसी से ग्रस्त है, जो राज्य
सरकार की आज्ञा
द्वारा निर्दिष्ट किये जायेंगे और
मुख्य चिकित्सा अधिकारी, से
अन्यून पद के किसी चिकित्साधिकारी
ने उस रोग को असाध्य
घोषित कर दिया है ;
-
परन्तु प्रतिबन्ध यह है कि खंड (च) की दशा में बकाया अदा कर देने पर तुरन्त अनर्हता
समाप्त हो जायेगी और प्रतिबन्ध यह भी है कि किसी कर अथवा पानी के मूल्य का बकाया जो उस
क्षेत्र, जिसको
अब अगर अनुसूचित कर दिया गया है,, में क्षेञाधिकार रखने वाली
नगरपालिका परिषद, अथवा अन्य स्थानीय प्राधिकारी को देय हो, उसको
2निगम
का बकाया समझा जायेगा।
-
राज्य विधान मण्ड्ल के निर्वाचनों
के प्रयोजनों के लिये तत्समय प्रवृत्त किसी विधि द्वारा या के अधीन अनर्ह हो;
किन्तु प्रतिबन्ध यह है कि कोई
व्यक्ति इस आधार पर अनर्ह नहीं होगा कि वह पचीस
वर्ष से कम आयु का है, यदि उसने इक्कीस
वर्ष की आयु प्राप्त कर ली हो;,
-
[*
* * * *]
-
[*
* * * *]
कोई व्यक्ति सभासद चुन लिये जाने पर सभासद बने रहने के लिये
अनर्ह होगा यदि वह
-
स्वयं अथवा किसी ऐसे फर्म के नाम से, जिसमें वह
साझीदार है, अथवा जिसके साथ वह वृत्तिक हैसियत से लगा हुआ है, किसी ऐसे वाद या
कार्यवाही के सिलसिले में जिसमें निगम अथवा मुख्य नगराधिकारी का कोई हित या सम्बन्ध
है (interested or concerned) वह वृत्तिक हैसियत
से रोक रखा जाता है अथवा
नियोजित किया जाता है; अथवा
-
बीमारी अथवा २निगम
द्वारा स्वीकृत अन्य किसी कारण से अनुपस्थिति को छेड़कर
२निगम के अधिवेशनों में लगातार
छ: महीने तक अनुपस्थित रहता है।
-
उपधारा
(1) के
खण्ड (ग) के अधीन कोई
व्यक्ति केवल इसलिये अनर्ह हुआ न समझा
जायगा कि वह
-
वह पेंशन पाता है,
-
नगर प्रमुख या उपनगर प्रमुख या सभासद के रूप में काम करते हुए कोई भत्ता या सुविधा
पाता है।
-
उपधारा (1) के
खण्डके अधीन कोई
व्यक्ति केवल इसलिये अनर्ह हुआ न समझा
जायगा कि उसका निम्नलिखित में कोई हिस्सा या हित है
-
कोई संयुक्त सम्भार समवाय
अथवा उत्तर
प्रदेश सहकारी समिति अधिनियम,
1965, के अधीन पंजीकृत अथवा पंजीकृत समझी गयी कोई
समिति जिससे निगम की ओर से मुख्य नगराधिकारी संविदा करेगा अथवा जिसे वह
नियोजित करेगा ;
-
निगम के लिये मुख्य नगराधिकारी को बेची जाने वाली किसी
ऐसी वस्तु के
प्रायिक विक्रय
में जिसमें वह किसी कलेंड्र वर्ष में कुल मिलाकर
2000 रू से अनधिक मूल्य का नियमित रूप से व्यापार करता है।
-
कोई व्यक्ति जो सभासद के रूप में निर्वाचित होने के पश्चात इस
द्वारा के अधीन
अनर्ह हो जाय, सभासद नहीं रह जायगा और उसका स्थान ऐसी अनर्हता होने के दिनांक से
रिक्त हो जायगा।
टिप्पणियाँ
दोषसिद्ध एवं दण्डादेश--
यदि सम्मोचन
(release) के पश्चात पाँच
वर्ष का समय न बीत
गया हो, तो कोई
व्यक्ति सदस्य के रूप में
निर्वाचित होने के लिए अनर्ह
(disqualified)
होगा। शरतचन्द्र बनाम खगेन्द्रनाथ, ए०आई०आर०
1961 एस०सी०
334,
यदि दोष-सिद्धि नैतिक
अक्षमता जैसे कि न्याय,
निष्ठा, शील अथवा सदाचार के
विरूद्ध
किसी अपराध के लिए हुई हो तो
ऐसा
व्यक्ति अनर्ह
(disqualified)
हो जायगा।
बालेश्वर सिंह बनाम जिला
मजिस्ट्रेट, बनारस,
ए०आई०आर०
1959
इला० 71
खाद्य
अपमिश्रण अधिनियम के अधीन किसी अपराध को एक नैतिक
अक्षमता का अपराध माना गया। इन्द्रलाल बनाम लच्छी
राम, ए०आई०आर०
1966, राजस्थान
42।
लाभ का पद धारण करना -
किसी
ऐसे व्यक्ति के विषय में कि जिससे युक्तियुक्त रूप से
लाभ अर्जित करने की आशा की जा सके, यह कहा जायगा कि वह लाभ का पद धारण करता है।
देवराज बनाम केशव, ए०आई०आर०
1954 बम्बई
214
( हेड्मास्टर सेकेन्ड्री
स्कूल बी०जी०
बरकट बनाम रिटर्निंग आफिसर, ए०आई०आर०
1978 बम्बई,
259 डाइरेक्टर आफ
कारपोरेशन, जिसकी नियुक्ति सरकार
द्वारा की गई है, के विषय में यह धारण किया गया कि
वह एक लाभ का पद धारण करता है।
गोविन्द बासू बनाम शंकर प्रसाद, ए०आई०आर०
1942 एस०सी०
254.।
निगम के साथ संविदा--
संसुगत तारीख पर संविदा में हित को किया जाना होगा।
चतुर्भुज विट्ठलदास जसनी बनाम मोरेश्वर परसराम, ए०आई०आर० एस०सी०
237.
लेकिन यदि राज्य ने संविदा का अनुसमर्थन न किया हो, तो कोई
अनर्हता न होगी। ललितेश्वर प्रसाद शाही बनाम बरटेश्वर
प्रसाद, ए०आई०आर०
1966 एस०सी०
500.
26. सभासद तथा
विशिष्ट सदस्य की पदावधि --
-
आकस्मिक
रिक्ति की पूर्ति के
निर्मित्त
निर्वाचित सभासद से भिन्न सभासद की पदावधि निगम के कार्यकाल
के समकक्ष होगी।
-
आकस्मिक रिक्ति की पूर्ति के लिये
निर्वाचित किसी भी सभासद अथवा
विशिष्ट सदस्य
का कार्यकाल उसके
पूर्वाधिकारी की पदावधि का अवशिष्ट भाग होगा।
27. सभासदों का
निर्वाचन--
-
सभासदों का
निर्वाचन इस अधिनियम के उपबन्धों और इसके अधीन
बने नियमों के अनुसार प्रौढ़ मताधिकार प्रणाली के अनुसार होगा।
-
अपने पद से हटने वाला सभासद
पूनर्निर्वाचन का पात्र होगा।
28. सभासदों के पद की आकस्मिक
रिक्ति --
यदि किसी सभासद की पदावधि समाप्त होने के पूर्व
उसके स्थान की
रिक्ति, उसकी मृत्यु तथा त्याग-पत्र अथवा अन्य किसी कारण से हो जाय, तो
ऐसी रिक्ति होने के पश्चात् यथाशीघ्र दूसरा सभासद यथाशक्य
उसी रीति से, किन्तु इस अधिनियम में एतदर्थ बनाये गये
उपबन्धों के अधीन रहते हुए निर्वाचित किया जाएगा, जो
सामान्य निर्वाचन में सभासदों के निर्वाचन के लिये इस अधिनियम द्वारा तथा उसके अधीन
उपबन्धित हो:
किन्तु प्रतिबन्ध यह है कि यदि पद से हटने वाले
(outgoing) सभासद की पदावधि
साधारणतः रिक्त होने के चार महीने के भीतर समाप्त हो रही हो, तो
ऐसी रिक्ति बिना
पूर्ति के
छोड़ दी जायगी जब तक कि निगम अन्यथा संकल्प न करे।
29.
सभासदों का
त्याग-पत्र कोई सभासद किसी समय अपने हस्ताक्षर सहित लेख, जो नगर
प्रमुख को सम्बोधित होगा, अपना पद त्याग सकता है और उसका त्याग-पत्र
नगर प्रमुख को
प्राप्त होते ही प्रभावी हो जायगा।
30.
एक से अधिक
कक्ष के निर्मित्त एक ही
व्यक्ति का निर्वाचन:-
-
यदि कोई व्यक्ति एक
से अधिक कक्षों से सभासद
निर्वाचित हो जाय तो वह
ऐसे अन्तिम निर्वाचन के दिनांक के तीन
दिन के भीतर मुख्य नगराधिकारी को उस
कक्ष की सूचना देगा, जिसकी सेवा में वह रहना
चाहता है।
-
ऐसी सूचना न देने पर मुख्य नगराधिकारी लाटरी डालकर
वह कक्ष निर्धारित करेगा और
उसको अधिसूचित करेगा, जिसकी सेवा में
ऐसा
व्यक्ति रहेगा।
-
ऐसा व्यक्ति इस प्रकार चुने हुए अथवा अधिसूचित कक्ष के लिये ही निर्वाचित समझा
जायगा तथा अन्य किसी कक्ष अथवा कक्षों के प्रतिनिधित्व के सम्बन्ध में उत्पन्न होने
वाली रिक्तियाँ नवीन निर्वाचन द्वारा द्वारा इस प्रकार भरी जायँगी मानो कि वे
आकस्मिक
रिक्तियाँ
हों।
30.
सदस्यों को वाहन-भत्ता या सुविधाएँ-
सभासदों को निगम के और
उसकी समितियों के अधिवेशनों में उपस्थित होने के लिये
ऐसा वाहन-भत्ता या वाहन
भत्ते के बदले में
ऐसी सुविधाएं दी जा सकती हैं जिनकी नियमों
द्वारा व्यवस्था की
जाय।,
कक्षों का परिसीमन
31.
कक्षों की व्यवस्था--
-
सभासदों के निर्वाचन के प्रयोजनार्थ द्वारा
32 में दी हुई रीति से
प्रत्येक नगर को प्रादेशिक निर्वाचन क्षेत्रों में
बाँटा जायगा जो कक्ष कहे जायेंगे, और प्रत्येक कक्ष के लिये पृथक
निर्वाचक नामावली
होगी।
-
प्रत्येक कक्ष का प्रतिनिधित्व, निगम में सभासद द्वारा किया जायेगा।
32. परिसीमान आज्ञा--
-
राज्य सरकार आज्ञा
द्वारा निम्नलिखित निर्धारित करेगी--
-
किसी नगरपालिका
क्षेत्र को ऐसी रीति से, कि प्रत्येक कक्ष की जनसंख्या जहाँ तक
सम्भव हो सके, संपूर्ण नगरपालिका
क्षेत्र में एक समान हो, कक्षों में विभाजित करेगी;
-
कक्षों की संख्या, जिसमें किसी नगरपालिका
क्षेत्र को विभाजित किया जायेगा,
अवधारित करेगी;
-
प्रत्येक कक्ष का विस्तार अवधारित करेगी;
-
अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों, पिछ्ड़े वर्गों या महिलाओं के लिये
आरक्षित किये जाने वाले स्थानों की संख्या अवधारित करेगी।
-
उपधारा
(1) के अधीन
आज्ञा का पांडुलेख आपत्तियों के लिये, जो
सात दिन
से कम न हो, सरकारी गजट में प्रकाशित किया जायेगा।
-
राज्य सरकार उपधारा
(2)
के अधीन की गयी किन्हीं आपत्तियों पर विचार करेगी, और
यदि आवाश्यक हुआ तो तदनुसार
आज्ञा का पांडुलेख संशोधित, परिवर्तित अथवा परिष्कृत
किया जायगा और तत्पाश्चात् वह अंतिम हो जायगा।
(3)
33.
परिसीमन
आज्ञा में परिवर्तन अथवा संशोधन और उसका प्रभाव--
-
राज्य सरकार अपनी
किसी परिवर्ति
आज्ञा (subsequent order)
द्वारा
32 की उपधारा
-
के अधीन की गयी किसी भी अंतिम
आज्ञा को
परिवर्तित अथवा
संशोधित कर सकती है।
-
उपधारा
(1) के अधीन किसी आदेश के परिवर्तन या
संशोधन के लिये, द्वारा
32 की उपधारा
(2)
और (3) के उपबन्ध यथावाश्यक परिवर्तनों सहित लागू होंगे।,
-
इस द्वारा के अधीन किसी भी अंतिम आज्ञा के परिवर्तन अथवा संशोधन के पश्चात्
राज्य सरकार विद्यमान सभासदों को परिवर्तित अथवा संशोधित कक्षों में इस प्रकार
विभाजित
(apportion)
कर देगी कि जहाँ तक युक्तितः साध्य हो, वे अपने पूर्व
निर्वाचन क्षेत्रों का यथासंभव अधिक से अधिक संख्या का
प्रतिनिधित्व करते रहें।
-
विद्यमान सभासद उसी कक्ष में पदासीन होगा जो उसे नियत किया गया है और उस पद पर ऐसी
दशा में पदासीन रहता यदि कक्ष अपवर्तित तथा असंशोधित ही रहे होते।
निर्वाचक तथा निर्वाचक नामावली
34-
35. प्रत्येक कक्ष के लिये
निर्वाचक नामावली--
प्रत्येक कक्ष के लिए एक
निर्वाचक
नामावली होगी, जो इस अधिनियम के उपबन्धों के अनुसार राज्य
निर्वाचन आयोग के अधीक्षण,
निदेशन और नियंत्रण के अधीन तैयार की जायेगी।,
36. निर्वाचकों की अर्हताएँ--
धारा
37 और
38 के उपबन्धों के अधीन रहते हुए,
प्रत्येक व्यक्ति जिसमें उस
वर्ष की जिसमें
निर्वाचक नामावली तैयार या पुनरीक्षित की
जाय, पहली जनवरी को
18
वर्ष की आयु पूरी कर ली हो, और जो कक्ष के
क्षेत्र में मामूली
तौर से निवासी हो, कक्ष की
निर्वाचक नामावली में पंजीयन का पात्र होगा।
स्पष्टीकरण--
-
किसी व्यक्ति के सम्बन्ध में केवल इसी कारण कि कक्ष के क्षेत्र में उसका किसी
निवास-गृह पर स्वामित्व या कब्जा है, यह समझ लिया जायगा कि वह किस क्षेत्र में
मामूली तौर से निवासी है।
-
मामूली निवास-स्थान से अपने
आपको अस्थायी रूप से अनुपस्थित रखने वाले व्यक्ति के सम्बन्ध में केवल इसी कारण यह
न समझा जायगा कि वह वहाँ मामूली तौर से निवासी नहीं रहा।
-
संसद या राज्य विधान मण्डल का सदस्य
ऐसे सदस्य के रूप में अपने
कर्तव्यों के सम्बन्ध में कक्ष के
क्षेत्र में अनुपस्थित रहने मात्र के कारण, अपनी
पदावधि के दौरान उस
क्षेत्र का मामूली तौर से निवासी होने से परिवारित नहीं समझा
जायगा।
-
यह निश्चिय करने के लिए कि किन
व्यक्तियों को किसी सुसंगत समय पर किसी
विशिष्ट क्षेत्र का मामूली तौर से निवासी समझा जाय या न समझा जाय, किन्हीं अन्य
तथ्यों पर, जिन्हें विहित किया जाय, विचार किया जायगा।
-
यदि किसी मामले में यह प्रश्न उठे कि किसी सुसंगत समय पर कोई
व्यक्ति
मामूली तौर से कहाँ का निवासी है तो उस वस्तु का अवधारण मामले के सभी तथ्यों के
निर्देश में किया जायगा।
37. निर्वाचकों की अनर्हताएँ--
-
कोई
व्यक्ति किसी
निर्वाचक नामावली में पंजीयन
के लिए अनर्ह होगा, यदि वह-
-
भारत का नागरिक न हो;
या
-
विकृत चित्त हो और उसके
ऐसा होने की किसी सक्षम न्यायालय की घोषणा विद्यमान
हो; या
-
निर्वाचन सम्बन्धी भ्रष्ट
आचरण और अन्य अपराधों से सम्बन्धित किसी विधि के उपबन्धों के अधीन मत देने के लिए
तत्समय अनर्ह हो।
-
किसी व्यक्ति, जो पंजीयन के
पश्चात् उपर्युक्त रूप से अनर्ह हो जाता है, का नाम
उस कक्ष की उस
निर्वाचक नामावली से जिसमें उसका नाम लिखा है, तुरन्त ही काट दिया
जायगाः
किन्तु प्रतिबन्ध यह है कि उपधारा
(1) के अधीन किसी अनर्हता के कारण किसी
व्यक्ति
का नाम किसी कक्ष की
निर्वाचक नामावली से काट दिया जाता है तो
उक्त नामावली के प्रचलित
रहने
(inforce)
की अवधि में, इस अधिनियम के उपबन्धों अथवा
उक्त अनर्हता निवारण को
प्राधिकृत कर दिये जाने पर उसे तुरन्त पुनः दर्ज कर लिया जायगा।
38. पंजीयन एक
कक्ष तथा एक स्थान में होना
-
कोई भी
व्यक्ति एक ही नगर में एक से
अधिक कक्षों के लिये
निर्वाचक नामावली में पंजीयन का पात्र होगा।
-
कोई भी व्यक्ति किसी कक्ष की
निर्वाचक नामावली में एक से अधिक बार पंजीकृत होने
का पात्र न होगा।
-
कोई
व्यक्ति किसी कक्ष की
निर्वाचक नामावली में पंजीयन का पात्र न होगा
यदि उसका नाम किसी अन्य नगर या किसी
लघुत्तर नगरीय
क्षेत्र, संक्रणाशील क्षेत्र,
छवनी या ग्राम पंचायत, से सम्बन्धित किसी
निर्वाचक नामावली में दर्ज हो जब तक कि वह
यह दर्शित न करे कि उसका नाम
ऐसी निर्वाचक नामावली से काट दिया गया है।
39. निर्वाचक नामावली की तैयारी और प्रकाशन--
-
राज्य
निर्वाचक आयोग के
अधीक्षण, निदेशन और नियंत्रण के अधीन रहते हुए, प्रत्येक कक्ष के लिये
निर्वाचक
नामावली मुख्य
निर्वाचन अधिकारी (नगर स्थानीय निकाय) के पर्यवेक्षण के अधीन निर्वाचन रजिस्ट्रीकरण अधिकारी
द्वारा नियमों द्वारा विहित रीति से तैयार और प्रकाशित की जायेगी।
-
उपधारा
(1) में
निर्दिष्ट मुख्य
निर्वाचन अधिकारी
(नगर स्थानीय निकाय) और
निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण अधिकारी राज्य सरकार के
ऐसे अधिकारी होंगे जिन्हें राज्य
निर्वाचन
आयोग, राज्य सरकार के परामार्श से, इस
निर्मित्त पदाभिहित या नाम-निर्दिष्ट करे।
-
निर्वाचक नामावली के प्रकाशन पर, इस अधिनियम के, या उसके अधीन बनाये गये नियमों
के, अनुसार किये गये किसी परिवर्तन, परिवर्धन या सुधार के अधीन रहते हए, वह इस
अधिनियम के अनुसार तैयार की गयी कक्ष की
निर्वाचक नामावली होगी।
-
निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण अधिकारी किसी कक्ष के लिये
निर्वाचक नामावली तैयार करने के
प्रयोजन के लिए तत्समय प्रवृत्त विधान सभा की सूची को राज्य
निर्वाचन आयोग के निदेश
के अनुसार अपना सकता है जहाँ तक उसका सम्बन्ध उस कक्ष के
क्षेत्र से हो;
किन्तु प्रतिबन्ध यह है कि
ऐसे कक्ष के लिये
निर्वाचक नामावली में,
ऐसे कक्ष के लिए
नाम-निर्देशन के अन्तिम दिनांक के
पश्चात् और उस निर्वाचन के पूरा होने के पूर्व
किसी संशोधन, परिवर्तन या सुधार को सम्मिलित नहीं किया जायगा।
-
जहाँ निर्वाचक
रजिस्ट्रीकरण अधिकारी का, चाहे उसको दिये गये किसी आवेदन-पत्र पर या
स्वप्रेरणा से,
ऐसी जाँच करने के
पश्चात् जिसे वह उचित समझे, यह समाधान हो जाय कि
निर्वाचक नामावली में कोई प्रविष्टि सुधारी या निष्कासित की जानी चाहिये या
रजिस्ट्रीकरण के लिये हकदार किसी
व्यक्ति का नाम
निर्वाचक नामावली में परिवर्तित किया
जाना चाहिए, वहाँ वह इस अधिनियम के और तदधीन बनाये गये नियमों और आदेशों के अधीन
रहते हुए किसी प्रविष्टि का, यथास्थिति, सुधार, निष्कासन या
परिवर्धन करेगा;
किन्तु प्रतिबन्ध यह है कि
ऐसा कोई सुधार,
निष्कासन या परिवर्धन कक्ष के किसी निर्वाचन के लिये नाम-निर्देशन होने
के अन्तिम दिनांक के पश्चात् और उस निर्वाचन के पूरा होने
के पूर्व, नहीं किया जायगा
किन्तु प्रतिबन्ध यह भी है कि किसी
व्यक्ति से संबंधित
प्रविष्टि का
ऐसा कोई
सुधार या निष्कासन जो उसके हित पर प्रतिकूल प्रभाव डालने वाला हो, उसे उसके
विरूद्ध;
प्रस्तावित कार्यवाही के संबंध में सुनवाई का समुचित अवसर दिये बिना, नहीं किया
जायगा।
-
निर्वाचक नामावली में किसी नाम को सम्मिलित करने, निष्कासित करने, या सुधार करने के
सम्बन्ध में निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण अधिकारी के किसी आदेश के विरूद्ध;
अपील ऐसे समय के भीतर और ऐसी रीति से और ऐसे अधिकारी या प्राधिकारी को, जैसा नियमों
द्वारा विहित किया जाय, प्रस्तुत की जायगी।
40. निर्वाचक नामावली का पुनरीक्षण--
राज्य
निर्वाचन आयोग, यदि वह सामान्य या
उपनिर्वाचन के प्रयोजन के लिये
ऐसा करना आवाश्यक समझे, सभी कक्षों की या किसी कक्ष
की निर्वाचक नामावली का
ऐसी रीति से जिसे वह उचित समझे, पुनरीक्षण करने का आदेश दे
सकता हैः
किन्तु प्रतिबन्ध यह है कि इस अधिनियम के अन्य उपबन्धों के अधीन रहते हुए, कक्ष की
निर्वाचक नामावली, जैसा कि वह कोई
ऐसा निदेश दिये जाने के समय प्रवृत्त हो,
प्रवृत्त बनी रहेगी जब तक कि इस प्रकार निर्देशित
पुनरीक्षण पूरा न हो जाये।
41.
निर्वाचकों तथा निर्वाचक नामावलियों से
सम्बद्ध अन्य
विषय-
जहाँ तक निम्नलिखित
विषयों में से किसी के संबंध में इस अधिनियम या उसके अधीन बनाये गये नियमों
द्वारा
उपबन्ध न किया जाय, राज्य
निर्वाचन आयोग,
निर्वाचक नामावली से
सम्बद्ध निम्नलिखित
विषयों के सम्बन्ध में
आज्ञा
द्वारा उपबन्ध बना सकता है, अर्थात-
-
दिनांक, जब इस अधिनियम के अधीन प्रथम बार तैयार की गई
निर्वाचक नामावलियाँ और
बाद में तैयार की गई
निर्वाचक नामावलियाँ प्रवृत्त होंगी तथा उसके प्रवर्तन की अवधि;
-
सम्बद्ध निर्वाचक
(elector) के प्रार्थना-पत्र पर
निर्वाचक नामावली की किसी वर्तमान
प्रविष्टि को ठीक करना;
-
निर्वाचक नामावलियों में लिपिक अथवा मुद्रण सम्बन्धी गलतियों को
ठीक करना;
-
किसी क्षेत्र के सम्बन्ध में
निर्वाचक नामावलियों में बहुत से नाम छूट जाने की
दशा में उनमें सुधार करना;
निर्वाचक नामावलियों में किसी भी
ऐसे व्यक्ति का नाम दर्ज करना:-
-
जिसका नाम कक्ष से सम्बद्ध क्षेत्र की विधान सभा की सूचियों में है; परन्तु कक्ष
की निर्वाचक नामावली में दर्ज नहीं है, अथवा जिसका नाम गलती से किसी अन्य कक्ष की
निर्वाचक नामावली में दर्ज कर लिया गया है, अथवा;
-
जिसका नाम विधान सभा की सूचियों में दर्ज नहीं है। परन्तु जो अन्यथा कक्ष की
निर्वाचक नामावली में पंजीयन के लिए अर्ह है।
-
ऐसे व्यक्तियों के नामों का अपवर्जन जो पंजीयन के लिये अनर्ह हैं;
-
ऐसे व्यक्तियों का अभिलेख रखना जो मत देने के लिये अनर्ह हैं;
-
नामों के समावेश तथा अपवर्जन के
निर्मित्त प्रार्थना-पत्र
पर देय शुल्क;
-
*
-
निर्वाचक नामावलियों की अभिरक्षा तथा परिरक्षण; तथा
-
सामान्यतः
निर्वाचक नामावलियाँ तैयार करने तथा उसे प्रकाशित करने से
सम्बद्ध सभी
विषय।
मतदान
42. मत देने का अधिकार-
-
कोई भी
व्यक्ति, जिसका नाम तत्समय किसी कक्ष की
निर्वाचक
नामावली में दर्ज नहीं है, उस कक्ष में मत देने का अधिकारी नहीं होगा तथा इस
अधिनियम द्वारा स्पष्ट रूप से उपबंधित
दशा को छोड़कर प्रत्येक
ऐसा
व्यक्ति, जिसका नाम
तत्समय किसी कक्ष की
निर्वाचक नामावली में दर्ज है, उस कक्ष में मत देने का अधिकारी
होगा।
-
कोई भी व्यक्ति किसी कक्ष के किसी
निर्वाचन में मत नहीं दे सकेगा यदि वह
द्वारा
३७ में उल्लिखित अनर्हताओं में से किसी के अधीन है।
-
कोई भी व्यक्ति किसी सामान्य
निर्वाचन में निगम के एक से अधिक कक्षों
में मतदान नहीं करेगा, और यदि वह
उक्त किसी एक से अधिक कक्षों में मतदान करता है, तो
सभी कक्षों में उसके मत शून्य हो जायेंगे।
-
इस बात के होते हुए भी कि किसी
निर्वाचक का नाम किसी कक्ष की
निर्वाचक नामावली में
एक से अधिक बार दर्ज हो गया है, वह
व्यक्ति किसी निर्वाचन में एक से अधिक बार मतदान
नहीं करेगा और यदि वह मतदान करता है, तो उस कक्ष में उसके सभी मत शून्य हो
जायेंगे।
-
यदि कोई व्यक्ति कारावास की, निर्वासन
की अथवा अन्य किसी प्रकार का दंण्ड के
अधीन किसी कारावास में बन्द है अथवा पुलिस की वैध अभिरक्षा
(lawful
custody)
में है, तो वह मतदान नहीं करेगा।
किन्तु प्रतिबन्ध यह है कि इस उपधारा में कोई बात उस
व्यक्ति पर लागू नहीं होगी,
जो तत्समय प्रचलित किसी विधि के अन्तर्गत निवारक निरोध
(preventive
detention)
के
अधीन हो।
43.
मतदान प्रणाली
44.
मतदान की रीति-
किसी कक्ष के प्रत्येक
निर्वाचन में, जहाँ मतदान लिया जाय, मत गूढ़
शलाका द्वारा दिये जायेंगे तथा कोई मत प्रतिनिधिक
मतदान
(secret
ballot)
द्वारा दिये जायेंगे तथा कोई मत प्रतिनिधिक मतदान
(proxy)
द्वारा नहीं लिया जायगा।
टिप्पणी
मतपत्र द्वारा मतदान- मतपत्र पर चिन्ह इस ढंग से लगाया जाना चाहिए कि उससे यह प्रकट हो कि
ऐसा चिन्ह लगाया जाना मतदाता का सोच-विचार करके किया गया कार्य था।
पी.आऱ फ्रांसिस
बनाम ए०वी० अरियान, ए०आई०आर०1986 केरल
252। मतपत्र की पीठ
पर बनाये गये चिन्ह को दोषपूर्ण धारण नहीं किया जा सकता, और
ऐसे मत को अस्वीकार नहीं किया जा सकता।
स्वरूप सागर बनाम इलेक्शन
ट्राइब्युनल, ए०आई०आर०
1960 इला०
66। मतपत्र पर चिन्ह
लगाये जाने के
विषय में होने वाले नियमों का अनुसरण किया जाना जरूरी है। यदि उनका
पूर्णरूपेण पालन नहीं किया जाता तो मत को अस्वीकार कर दिया जायगा।
पी० वेंकटानारायण बनाम जी०वी०एस० राव, ए०आई०आर०
1967 आन्ध्र प्रदेश
11।
निर्वाचनों का संचालन
45. निर्वाचनों के संचालन का अधीक्षण, आदि-
-
निगम के नगर प्रमुख, उप नगर प्रमुख और सभासदों के निर्वाचन के संचालन का अधीक्षण,
निदेशन और नियंत्रण राज्य निर्वाचन आयोग में निहित होगा।
-
उपधारा
(1) के अधीन रहते हुए
द्वारा
39
की उपधारा
(2) में निर्दिष्ट
मुख्य निर्वाचन अधिकारी
(नगर स्थानीय निकाय) निगम के नगर प्रमुख, उपनगर प्रमुख और
सभासदों के निर्वाचनों
के संचालन का पर्यवेक्षण करेगा।
46. निर्वाचनों के संचालन सम्बन्धी आदेश-
किसी मामले के सम्बन्ध में, जहाँ तक इस
अधिनियम द्वारा उपबन्ध नहीं बनायें गये
हैं, राज्य
निर्वाचन आयोग, आदेश
द्वारा नगर
प्रमुख सभासदों के स्थानों से सम्बन्धित
मामलों की व्यवस्था कर सकता है अर्थात-
-
निर्वाचन अधिकारियों, सहायक
निर्वाचन अधिकारियों,
निर्वाचन अध्यक्षों तथा मतदान
अधिकारियों और
क्लकों की नियुक्ति, उनके अधिकार और
कर्त्तव्य;
-
नाम-निर्देशन, परीक्षण, नाम वापस लेने तथा मतदान के लिये दिनांकों को
निश्चित करना;
-
वैध
(valid) नाम-निर्देशन-पत्र प्रस्तुत करने की रीति तथा तदर्थ अपेक्षाएँ,
नाम-निर्देशनों का परीक्षण तथा उम्मीदवारों से नाम वापस लेना;
-
निर्वाचन अभिकर्त्ताओं, मतदान
अभिकर्त्ताओं तथा गणना
अभिकर्त्ताओं की नियुक्ति तथा उनके
कर्त्तव्य ;
-
सामान्य निर्वाचनों के
विषय में प्रक्रिया, जिसमें मतदान के पूर्व ही किसी
उम्मीदवार की मृत्यु हो जाना भी है, सविरोध एवं निर्विरोध
निर्वाचनों
(contested
or uncontested) की
प्रक्रिया;
-
मतदाताओं की पहचान;
-
मतदान का समय;
-
मतदान का स्थगित किया जाना तथा फिर से मतदान करना;
-
निर्वाचनों में मतदान की रीति;
-
मतों का परीक्षण तथा उनकी गणना और पुनर्गणना तथा मतों की संख्या की समानता की
दशा में अनुसरित की जाने वाली
प्रक्रिया और परिणामों की घोषणा;
-
सभासद नगर प्रमुख अथवा उप-नगर प्रमुख के रूप में निर्वाचित व्यक्तियों
के नामों की विज्ञप्ति;
-
जमा की हुई
धनराशियों की वापसी तथा जब्ती;
-
निर्वाचन अध्यक्ष, मतदान अभिकर्त्ता तथा अन्य ऐसे
व्यक्ति द्वारा मतदान की रीति, जो
किसी कक्ष में
निर्वाचक होने के कारण मतदान के अधिकारी हैं, किन्तु जो किसी
ऐसे
पोलिंग-स्टेशन पर कार्य के लिये नियुक्त किया गया है, जहाँ वह मतदान का अधिकारी
नहीं है;
-
प्रक्रिया, जो ऐसे
व्यक्ति द्वारा मतदान के सम्बन्ध में अनुसरित की जायगी जो अपने को
ऐसा निर्वाचक बतलाता है जिसके नाम से कोई अन्य
व्यक्ति मत दे चुका है;
-
मतदान बक्सों, मत-पत्रों तथा
निर्वाचन सम्बन्धी अन्य कागज-पत्रों की अभिरक्षा, अवधि,
जब तक के लिये उन्हें सुरक्षित रखना है तथा
ऐसे कागज-पञों का निरीक्षण करना तथा
उन्हें प्रस्तुत करना;
-
-
निर्वाचन-पत्रों की प्रतियों को जारी करना तथा उन प्रतियों के लिये मूल्य
निर्धारित
करना;
-
उपनगर प्रमुख के
निर्वाचन के लिए सभासदों की सूची रखना; और
-
सामान्यतया
निर्वाचनों के संचालन सम्बन्धी अन्य सभी
विषय।
47. निर्वाचनों का न हो पाना -
-
यदि सभासद के किसी
निर्वाचन में कोई स्थान
बिना पूर्ति के रह जाता है, तो उस
रिक्ति की पूर्ति के लिये फिर से
निर्वाचन होगा।
-
निर्वाचन के संचालन तथा सभासद के कार्यकाल निर्धारण के
लिए उपधारा
(१) के
अधीन हुए निर्वाचन के
विषय में यह समझा जायगा कि वह
आकस्मिक
रिक्ति की पूर्ति के लिये
हुआ है।
48. निर्वाचन अपराध -
-
लोक-प्रतिनिधित्व अधिनियम,
1951
के भाग-सात के अध्याय
तीन की धारा
125, 126, 127,
127-क, 128, 129,
130, 131, 132,
134, 134-क, 135,
89, 135-क, और
136
के उपबन्ध इस प्रकार प्रभावी होंगे, मानो-
-
किसी निर्वाचन के सम्बन्ध में आया हुआ निर्देश इस अधिनियम के अधीन किये गये
निर्वाचन का निर्देश हो;
-
शब्द ''निर्वाचन क्षेत्र" के स्थान पर
शब्द कक्ष रख दिया गया हो;
-
धारा
127-क की उपधारा
(2)
के खण्ड (ख) के उपखण्ड (1) में
शब्द मुख्य
निर्वाचन अधिकारी के स्थान पर
शब्द मुख्य
निर्वाचन अधिकारी
(नगर स्थानीय
निकाय) रख दिये गये हों;
-
धारा
134 आर
136 में,
शब्द ''इस अधिनियम के
द्वारा या अधीन के स्थान पर
शब्द
उत्तर प्रदेश
नगर निगम अधिनियम,
1959 के
द्वारा या अधीन रख दिये गये हों;
-
यदि मुख्य
निर्वाचन अधिकारी
(नगर स्थानीय निकाय) को यह विश्वास करने
का कारण हो कि निगम के किसी
निर्वाचन के सम्बन्ध में
उक्त अध्याय की द्वारा
129 या
134, 94,
या 134-क
अथवा द्वारा
136 की उपधारा
(2) के खण्ड (क) के अधीन दण्डनीय कोई अपराध किया गया
है, तो वह ऐसी जाँच करा सकता है और
ऐसे अभियोजन चला सकता है जो उसे परिस्थितियों
को देखते हुए आवाश्यक प्रतीत हों।
-
धारा
129 अथवा
134, 95 अथवा
134-क के अधीन अथवा
धारा
136 की उपधारा
(2)
के खण्ड (क) के अधीन दण्डनीय किसी भी अपराध की सुनवाई कोई न्यायालय तब तक न
करेगा जब तक कि
मुख्य
निर्वाचन अधिकारी
(नगर स्थानीय निकाय), की
आज्ञा
द्वारा अथवा
उसके प्राधिकार के अधीन कोई
शिकायत न की जाये।
49. सिविल न्यायालयों की अधिकारिता पर रोक -
किसी सिविल न्यायालय को निम्नलिखित
की अधिकारिता न होगी
-
इस प्रश्न को ग्रहण करना या उस पर निर्णय देना कि कोई
व्यक्ति किसी कक्ष को
निर्वाचक नामावली में पंजीयन का पात्र है या नहीं; या
-
निर्वाचक नामावली के तैयार करने और प्रकाशन के सम्बन्ध में राज्य
निर्वाचन
आयोग द्वारा या उसके प्राधिकार के अधीन की गयी किसी कार्यवाही की वैधता पर आपत्ति करना;
या
-
निर्वाचन अधिकारी
द्वारा या किसी
निर्वाचन के सम्बन्ध में इस अधिनियम के अधीन नियुक्त किसी
व्यक्ति द्वारा की गयी किसी कार्यवाही या किसी विनिश्चय
की वैधता पर आपत्ति करना।
50. निर्वाचन और रिक्ति के लिये अधिसूचना -
-
किसी निगम के गठन या पुनर्गठन के
प्रयोजन के लिए एक सामान्य
निर्वाचन कराया जायेगा।
-
उक्त प्रयोजन के लिए, राज्य सरकार सरकारी गजट में प्रकाशित अधिसूचना
द्वारा ऐसे
दिनांक को जिसकी राज्य
निर्वाचन आयोग
द्वारा सिफारिश की जाये, नगर में सभी कक्षों को,
इस अधिनियम के उपबन्धों और इसके अधीन बनाये गये नियमों और आदेशों के अनुसार
सभासदों और नगर प्रमुख का
निर्वाचन करने के लिए, आहूत करेगी।
-
राज्य सरकार, राज्य
निर्वाचन आयोग के परामार्श से, सरकारी गजट में
प्रकाशित अधिसूचना
द्वारा, धारा १२ के अधीन उप-नगर प्रमुख के
निर्वाचन के लिये एक या
उससे अधिक दिनांक नियत करेगी और सभासदों को इस अधिनियम के उपबन्धों के अनुसार
उप-नगर प्रमुख का
निर्वाचन करने के लिये आहूत करेगी।
-
यदि मृत्यु या त्याग-पत्र या किसी अन्य कारण से नगर प्रमुख, उप-नगर प्रमुख या
किसी सभासद के पद में कोई
आकस्मिक
रिक्ति होती है, तो, यथास्थिति
ऐसा पद या स्थान
राज्य सरकार द्वारा, सरकारी गजट में
प्रकाशित अधिसूचना
द्वारा, रिक्त घोषित कर दिया
जायेगा।
-
जब कोई पद या स्थान
रिक्त
घोषित कर दिया गया हो तो राज्य
निर्वाचन आयोग सरकारी
गजट में अधिसूचना
द्वारा सम्बन्धित कक्ष या, यथास्थिति, सभासदों को इस अधिनियम के
उपबन्धों और इसके अधीन बनाये गये नियमों या आदेशों
के अनुसार ऐसी रिक्ति को भरने के प्रयोजन से, ऐसे दिनांक के पूर्व, जैसा कि
अधिसूचना में विनिर्दिष्ट किया जाये, किसी व्यक्ति का निर्वाचन करने के लिए आहूत
करेगा।
कार्यकारिणी समिति
51.
कार्यकारिणी समिति का संगठन तथा अवधि -
-
कार्यकारिणी समिति
-
नगर-प्रमुख, जो पदेन कार्यकारिणी, समिति का सभापति
(chairman)
होगा, तथा
-
ऐसे 12
व्यक्तियों को, जो निगम द्वारा सभासदों में से चुने जायेंगे,
से मिलकर बनेगी।
-
कार्यकारिणी समिति उनके प्रथम अधिवेशन में तथा तत्पाश्चात उतनी बार, जितना कि
उपसभापति के स्थान की
रिक्ति की पूर्ति करने के
निर्मित्त आवाश्यक हो, अपने सदस्यों
में से किसी एक को उपसभापति
निर्वाचित करेगी।
-
उपसभापति, ज्यों ही वह कार्यकारिणी समिति का सदस्य न रहे, उप-सभापति न रहेगा।
-
उपधारा
(1) के खंड
(2) में अभिनिर्दिष्ट
व्यक्ति निगम
द्वारा सामान्य
निर्वाचन के पश्चात होने वाले उसके प्रथम अधिवेशन में
निर्वाचित किये जायेंगे।
-
कार्यकारिणी समिति के आधे सदस्य प्रत्येक अनुगामी वर्ष में उस महीने की पहली
तारीख के मध्यान्ह में, जिसमें कि उपधारा
(4)
में उल्लिखित
निगम का पहला
अधिवेशन निष्पन्न हुआ था, सेवा-निवृत्त हो जाया करेंगेः
किन्तु प्रतिबन्ध यह है कि जब सामान्य निर्वाचन सम्पन्न हो, तब कार्यकारिणी समिति
के समस्त पदासीन सदस्य उपधारा (4) के अधीन नयी समिति के
निर्वाचित होने पर सेवा-निवृत्त
हो जायेंगे।
-
वे सदस्य, जो उपधारा
(5)
के अधीन अपने उपधारा (4)
के अन्तर्गत निर्वाचन के एक
वर्ष पश्चात सेवा-निवृत्त हों, उपधारा
(5) में निर्दिष्ट सेवानिवृत्ति के
पूर्व ऐसे समय और रीति से, जिसे कार्यकारिणी समिति का सभापति अवधारित करे, लाटरी
डालकर निर्धारित किये जायेंगे तथा अनुगामी वार्षों में वही सदस्य इस
धारा के अधीन
सेवा-निवृत्त होंगे, जिनका कार्यकाल अधिकतम रहा होः
किन्तु प्रतिबन्ध यह है कि उस सदस्य की दशा में, जो पुनर्नियुक्त हुआ हो, उसके इस
उपधारा के प्रयोजनों के
निर्मित्त कार्यकाल का आकलन उसकी पुनर्नियुक्ति के दिनांक से
किया जायगा।
-
निगम उपधारा
(2) में
निर्दिष्ट सेवा निवृत्ति के दिनांक से
ठीक पूर्व
पड़ने वाले महीने में निष्पन्न अपने अधिवेशन में कार्यकारिणी समिति के नये सदस्य
उन व्यक्तियों के पदों की पूर्ति करने के
निर्मित्त नियुक्त करेगी जिन्हें
उक्त दिनांक
पर सेवा-निवृत्त होना हो।
-
समिति के किसी सदस्य के स्थान की
आकस्मिक
रिक्ति की पूर्ति उसके
शेष कार्यकाल
तक के लिए एक सदस्य
निर्वाचित करके की जायगीः
किन्तु प्रतिबन्ध यह है कि यदि
शेष अवधि दो मास से कम की है, जो उस
रिक्ति की
पूर्ति नहीं की जायगी जब तक कि
निगम अन्यथा संकल्प न करे।
-
सेवा-निवृत्त होने वाला सदस्य पुननिर्वाचन का पात्र होगा।
52.
कार्यकारिणी समिति के सदस्यों का
निर्वाचन कार्यकारिणी समिति के सदस्यों तथा उसके
उप-सभापति का
निर्वाचन अनुपाती प्रतिनिधित्व पद्धति
(System
of proportional representation)
के अनुसार संमणीय मत
(Single
transferable vote)
द्वारा होगा तथा
ऐसे निर्वाचन में मतदान गूढ़
शलाका
(secret
ballot)
द्वारा होगा।
53.
कार्यकारिणी समिति के सदस्यों का पद-त्याग कार्यकारिणी समिति का कोई भी सदस्य,
जो अपना पद त्याग करना चाहे, नगर-प्रमुख को सम्बोधित करके अपने हस्ताक्षर सहित लेख
द्वारा ऐसा कर सकता है और वह नगर-प्रमुख को प्राप्त होने के साथ ही प्रभावी हो जायगा।
विकास समिति
54.
विकास समिति का
संगठन तथा उसका कार्यकाल:-
-
विकास-समिति
-
उपनगर-प्रमुख, जो कि इसका पदेन सभापति
(chairman) होगा,
-
सभासदों में से निगम
द्वारा निर्वाचित किये जाने वाले दस
व्यक्तियों; तथा
-
ऐसे दो व्यक्तियों जो खंड
(क) और (ख) में उल्लिखित सदस्यों
द्वारा ऐसे
व्यक्तियों में से, जिन्हें
उक्त सदस्यों की राय में निगम के
प्रशासन अथवा
सुधार, विकास या नियोजन संबन्धी विषयों का अनुभव हो, संयोजित
(co-opted) किये
जायेंगे;
से मिलकर बनेगी।
-
विकास समिति अपने प्रथम अधिवेशन में तथा तत्पश्चात् उप-सभापति के पद में
रिक्ति होने के कारण जब कभी आवाश्यक हो,
निर्वाचित सदस्यों में से एक को अपना
उप-सभापति निर्वाचित करेगी।
-
उप-सभापति सदस्य न रहने पर यथाशीघ्र पद छोड़ देगा।
-
संयोजित
(co-opted) सदस्य को विकास समिति अथवा उसी किसी उप समिति में, जिसका वह
सदस्य हो, भाषण करने तथा उसकी कार्यवाहियों में अन्य प्रकार से भाग लेने का अधिकार
होगा, किन्तु वह इस उपधारा के आधार पर मत देने का अधिकारी न होगा।
-
संयोजित सदस्य का कार्यकाल एक
वर्ष होगा।
-
उपधारा (1) के खंड
(ख) में अभिदिष्ट
व्यक्ति निगम
द्वारा सामान्य निर्वाचनों
के पश्चात् होने वाले उसके पहले अधिवेशन में
निर्वाचित किये जायेंगे।
-
विकास समिति के आधे सदस्य प्रत्येक अनुगामी वर्ष में उस महीने के पहले दिन के
मध्यान्ह में, जिसमें कि उपधारा
(6) में उल्लिखित निगम का पहला अधिवेशन
निष्पन्न हुआ था, सेवानिवृत्त हो जाया करेंगेः
किन्तु प्रतिबन्ध यह है कि जब सामान्य निर्वाचन सम्पन्न हो तब विकास समिति के समस्त
पदासीन सदस्य उपधारा
(6) के अधीन नयी समिति के
निर्वाचित होने पर सेवा-निवृत्त
होंगे।
-
वे
सदस्य, जो उपधारा (7) के अधीन अपने उपधारा (7) के अधीन निर्वाचन के एक वर्ष
पश्चात् सेवानिवृत्त होंगे, उपधारा
(7) में निर्दिष्ट सेवानिवृत्ति के
दिनांक के पूर्व
ऐसे समय और रीति से, जिसे विकास समिति का सभापति अवधारित करे,
लाटरी डालकर चुने जायेंगे तथा अनुगामी
वर्षों में वे ही सदस्य इस
द्वारा के अधीन
सेवा-निवृत्त होंगे, जिनका कार्यकाल अधिकतम रहा होः
किन्तु प्रतिबन्ध यह है कि उस सदस्य की दशा में, जो पुनर्नियुक्त हुआ हो, उसके इस
उपधारा के प्रयोजनों के
निर्मित्त कार्यकाल का आकलन उनकी पुनर्नियुक्ति के दिनांक से
किया जायगा।
-
निगम उपधारा (7) में
निर्दिष्ट सेवा निवृत्ति के दिनांक से
ठीक पूर्व
पड़ने वाले महीने में
निष्पन्न अपने अधिवेशन में विकास समिति के नये सदस्य उन
व्यक्तियों के पदों की पूर्ति करने के
निर्मित्त नियुक्त करेगी, जिन्हें
उक्त दिनांक पर
सेवा-निवृत्त होना हो।
-
समिति के किसी सदस्य के स्थान की
आकस्मिक
रिक्ति की पूर्ति पद से हटने वाले
सदस्य के शेष कार्यकाल तक के लिए की जायेगीः
किन्तु प्रतिबन्ध यह है कि यदि
उक्त
शेष अवधि दो मास से कम की है तो उस
रिक्ति की
पूर्ति नहीं की जायगी जब तक कि निगम अन्यथा संकल्प न करे।
-
सेवा-निवृत्त होने वाला कोई सदस्य, चाहे वह
निर्वाचित रहा हो अथवा संयोजित,
पूनर्निर्वाचन अथवा पुनर्संयोजन का पात्र होगा।
55. विकास समिति के सदस्यों का
निर्वाचन -
विकास समिति के सदस्यों तथा उसके उप-सभापति
(Vice-Chairman) का
निर्वाचन अनुपाती प्रतिनिधित्व पद्धति
(system
of proportional representation) के अनुसार एकल संक्रमणीय मत
(single
transferable vote)
द्वारा होगा तथा ऐसे निर्वाचन में मतदान गूढ़
शलाका
(secret
ballot)
द्वारा होगा।
56. विकास समिति के सदस्यों का पद-त्याग -
विकास समिति का कोई भी सदस्य, जो अपना पद
त्याग करना चाहे अपने हस्ताक्षर सहित लिखित त्यागपत्र नगर प्रमुख को प्रस्तुत कर सकता
है और ऐसा त्याग-पत्र नगर प्रमुख को मिल जाने पर प्रभावी हो जायेगा।
धारा 5 के खंड
(ड़) के अधीन संगठित समितियाँ
57.
-
धारा
5 के खंड
(ड़) के अधीन समितियों का
संगठन (1) द्वारा
5 के खंड
(ड़) के अधीन
संगठित किसी समिति में उतने ही सदस्य होंगे जितने कि निगम
निर्धारित करे,
किन्तु उनकी संख्या
12 से अधिक न होगी।
-
राज्य सरकार के एतदर्थ किन्हीं ऐसे निर्देशों के, यदि कोई हों, अधीन रहते हुए
उपधारा (1) में उल्लिखित किसी समिति के सदस्य अपने में से एक सभापति तथा एक
उपसभापति चुनेंगे तथा सभापति अथवा उपसभापति के पद की किसी
आकस्मिक
रिक्ति की पूर्ति
नये निर्वाचन
द्वारा करेंगे।
-
कार्यकारिणी समिति के सदस्यों की पदावधि तथा
निर्वाचन की रीति से सम्बद्ध उपबन्ध
द्वारा 5
के खंड
(ड़) के अधीन संगठित किसी समिति पर यथाशक्य लागू होंगे।
57-
क. महानगर योजना समिति
-
सम्पूर्ण महानगर
क्षेत्र के लिए एक विकास योजना
प्रारूप तैयार करने के लिए प्रत्येक महानगर
क्षेत्र में एक महानगर योजना समिति
संगठित
की जाएगीइ;
-
उपधारा (1) में
निर्दिष्ट महानगर योजना समिति का एक अध्यक्ष जो नियमों
द्वारा नियत रीति से चुना जायगा, और इक्कीस से अन्यून और तीस से अनधिक इतनी संख्या में
सदस्यों से, जो राज्य सरकार आदेश
द्वारा विनिर्दिष्ट करे, मिलकर बनेगी।
-
उपधारा (2) के अधीन विनिर्दिष्ट कुल सदस्यों की संख्या में से
-
(क) दो तिहाई सदस्य महानगर
क्षेत्र में नगरपालिकाओं के
निर्वाचित सदस्यों और
पंचायतों के अध्यक्षों
द्वारा, और उस क्षेत्र में नगरपालिकाओं की और पंचायतों की
जनसंख्या के बीच अनुपात के अनुसार अपने में से
निर्वाचित किए जाएगें;
और
(ख)एक तिहाई सदस्य राज्य सरकार द्वारा निम्नलिखित में से
नाम निर्दिष्ट किये जायेंगे
-
एक अधिकारी, जो केन्द्र सरकार के
शहरी विकास मंत्रालय में उपसचिव से अनिम्न
स्तर का हो;
-
एक अधिकारी, जो राज्य सरकार के नगर विकास विभाग में संयुक्त सचिव से अनिम्न
स्तर का हो;
-
एक अधिकारी, जो राज्य सरकार के वन विभाग में संयुक्त सचिव से अनिम्न स्तर का
हो;
-
मुख्य नगर एवं ग्राम्य नियोजक, उत्तर प्रदेश;
-
निदेशक, पयरवरण, उत्तर प्रदेश;
-
उत्तर प्रदेश जल संभरण तथा सीवर व्यवस्था अधिनियम,
1975 के अधीन स्थापित
जल निगम का प्रबन्ध निदेशक;
-
उत्तर प्रदेश जल संभरण तथा सीवर व्यवस्था अधिनियम,
1975 के अधीन स्थापित
महानगर क्षेत्र में स्थित जल संस्थान का महाप्रबन्धक;
-
लोक निर्माण विभाग का एक अधीक्षण अभियन्ता;
-
उत्तर प्रदेश राज्य विद्युत परिषद का एक अधीक्षण अभियन्ता;
-
महानगर क्षेत्र में विकास प्राधिकरण का उप सभापति।
-
उपधारा (3) के
खण्ड (क) में निर्दिष्ट महानगर योजना समिति का
निर्वाचित
सदस्य जिस पद पर होने के आधार पर
ऐसा सदस्य बना था, उस पद पर न रहने पर समिति का
सदस्य न रह जायेगा।
-
उपधारा (3) के
खण्ड (ख) के उपखण्ड (एक) में निर्दिष्ट कोई सदस्य
शहरी
विकास विभाग में भारत सरकार के सचिव की सिफारिश पर नाम-निर्दिष्ट किया जायेगा।
-
सदस्यों की कोई
रिक्ति महानगर योजना समिति के
संगठन या पुनर्संगठन में बाधक
नहीं होगी।
-
महानगर योजना समिति विकास योजना प्रारूप तैयार करने में-
-
निम्नलिखित का ध्यान रखेगी;
-
महानगर क्षेत्र में नगरपालिकाओं और पंचायतों
द्वारा तैयार की गयी योजनायें;
-
नगरपालिकाओं और पंचायतों के बीच सामान्य हित के मामले, जिनके अन्तर्गत उस
क्षेत्र की समन्वित स्थानिक योजना, जल और अन्य भौतिक तथा प्राकृतिक साधनों में
हिस्सा, अवसंरचना का एकीकृत विकास और पयरवरण संरक्षण है;
-
भारत सरकार और राज्य सरकार
द्वारा निश्चित समस्त
उद्देश्य और प्राथमिकताएँ;
-
उन विनिधानों की सीमा और प्रकृति जो भारत सरकार;
और राज्य सरकार के अधिकरणों
द्वारा महानगर क्षेत्र में किए जाने सम्भाव्य हैं तथा
अन्य उपलब्ध साधन चाहे वे वित्तीय हों या अन्य;
-
ऐसी संस्थाओं और संगठनों से परामार्श करेगी जिन्हें राज्यपाल, आदेश
द्वारा,
विनिर्दिष्ट करें।
-
महानगर विकास समिति का अध्यक्ष
ऐसी समिति
द्वारा सिफारिश की गई विकास योजना
राज्य सरकार को भेजेगा।
स्पाष्टीकरण-
इस
धारा के प्रयोजनों के लिए नगरपालिका का तात्पर्य नगर निगम,
नगरपालिका परिषद और नगर पंचायत से है।
58.मुख्य नगराधिकारी
-
मुख्य नगर अधिकारी और अपर मुख्य नगर अधिकारी की नियुक्ति राज्य सरकार
प्रत्येक नगर निगम के लिए एक मुख्य नगर अधिकारी, और एक या अधिक अपर मुख्य नगर
अधिकारी, जैसा वह उचित समझे, नियुक्त करेगीः
-
किन्तु प्रतिबन्ध यह है कि कोई
व्यक्ति जो पहले से
राज्य सरकार की सेवा
में नहीं है, तब तक मुख्य नगर अधिकारी के रूप में नियुक्त नहीं किया जायेगा, जब तक
कि राज्य लोक सेवा आयोग उसकी नियुक्ति
का अनुमोदन न कर देः
-
किन्तु प्रतिबन्ध यह भी है कि किसी
व्यक्ति को अपर मुख्य नगर अधिकारी के रूप
में तब तक नियुक्त नहीं किया जायगा जब तक कि वह निगम का ज्येष्ठतम
वेतनमान में उप नगर अधिकारी न हो।
59.
मुख्य नगर अधिकारी और अपर मुख्य नगर अधिकारी के, वेतन और भत्ते, आदि
-
मुख्य नगराधिकारी और अपर मुख्य नगर अधिकारी, निगम निधि में से उतना मासिक वेतन और
ऐसे भत्ते प्राप्त करेगा जो राज्य सरकार समय-समय पर निर्धारित करे।
-
नियोजन
(Employment)
की अन्य शर्तें जिनमें
छुट्टियाँ पेंशन तथा भविष्य
निधि
(Provident
Fund) में अंशदान भी सम्मिलित हैं, वे होंगी, जिन्हें राज्य
सरकार विहित करे।
निर्वाचनों से सम्बद्ध विवाद
60.
जब तक आपत्ति आदि न की जाय
निर्वाचन मान्य होगा -
इस अधिनियम
द्वारा अथवा इसके अधीन की
गयी व्यवस्था के अनुकूल आपत्ति न की जायगी।
61. नगर-प्रमुख या उपनगर-प्रमुख, के
निर्वाचन पर आपत्ति करना -
-
किसी
व्यक्ति
के नगर-प्रमुख या उपनगर-प्रमुख, के रूप में
निर्वाचन पर उक्त निर्वाचन का कोई भी
असफल उम्मीदवार अथवा कोई भी
व्यक्ति, जिसका निर्वाचन-पत्र अस्वीकार कर दिया गया हो
अथवा निगम का कोई भी सदस्य नगर में क्षेञाधिकारयुक्त जिला जज के समक्ष
द्वारा 71 में उल्लिखित एक या एकाधिक आधारों पर याचिका प्रस्तुत करके आपत्ति कर सकता
है।
-
याचिका निर्वाचन फल
घोषित होने के सात दिन के भीतर प्रस्तुत की जायगी।
62. सभासद के
निर्वाचन पर आपत्ति करना -
-
सभासद के रूप में किसी ऐसे
व्यक्ति द्वारा जिसका
निर्वाचन में नाम-निर्देशन-पत्र अस्वीकार कर दिया गया हो या
सम्बद्ध कक्ष के
निर्वाचक द्वारा आपत्ति की जा सकती है।
-
याचिका द्वारा
71
में उल्लिखित एक या एकाधिक आधारों पर प्रस्तुत की जा सकती है।
-
किसी व्यक्ति के सभासद के रूप में
निर्वाचन पर इस आधार पर आपत्ति नहीं
की जा सकेगी कि किसी
व्यक्ति का नाम, जो मत देने के लिए अर्ह था,
निर्वाचन-सूची अथवा
सूचियों में लुप्त कर दिया गया है अथवा किसी
व्यक्ति का नाम, जो मत देने के लिए अर्ह
नहीं था, निर्वाचन-सूची अथवा सूचियों में सम्मिलित कर दिया गया है।
-
याचिका निर्वाचन के परिणाम की घोषणा के
30
दिन के भीतर नगर में अधिकारिता का
प्रयोग करने वाले जिला जज को प्रस्तुत की जायेगी।
63. आवेदन का आकार-पत्र तथा उसका विषय -
-
निर्वाचन आवेदन में यह या वे आधार
निर्दिष्ट रहेंगे, जिन पर प्रतिवादी
(respondent) के
निर्वाचन के सम्बन्ध में
आपत्ति की गयी हो और उसमें उन वास्तविक तथ्यों का भी संक्षिप्त उल्लेख होगा, जिन पर
आवेदक
(petitioner) आश्रय करता है। उसमें उस भ्रष्टाचार के, जिसके
विषय में आवेदक
का कथन है कि उसका व्यवहार हुआ है, पूरे विवरण उल्लिखित किये जायेंगे और उन पक्षों
(parties) के नाम, जिनके सम्बन्ध में यह कहा गया है कि उन्होंने भ्रष्टाचार का
व्यवहार किया है तथा इस प्रकार किये गये भ्रष्टाचार का दिनांक और स्थान, आदि के
सम्बन्ध में यथासम्भव पूरा ब्योरा दिया जायेगा।
-
आवेदन पर और यदि उसके साथ कोई अनुसूची अथवा संलग्नक
(annexure) हो तो
ऐसी
अनुसूची अथवा संलग्नक पर भी आवेदक के हस्ताक्षर होंगे तथा वह
ऐसी रीति से
प्रमाणीकृत होगा, जो कोड आफ सिविल प्रोसीजर,
1908 में पक्ष निवेदनों
(pleading)
के प्रमाणीकरण के लिए
निर्दिष्ट की गयी है।
-
आवेदक
(petitioner)µ
-
यदि वह द्वारा
64
के अधीन किसी घोषणा का दावा करता है तो अपने से भिन्न अन्य
सभी प्रतिद्वन्दी उम्मीदवारों को तथा अन्य किसी
दशा में सभी निर्वाचित उम्मीदवारों को; और
-
अन्य ऐसे उम्मीदवारों को, जिसके
विरूद्ध;
अपने आवेदन में प्रतिवादी के रूप में
सम्मिलित करेगा।
टिप्पणियाँ
उद्देश्य- द्वारा निर्वाचन याचिका का प्ररूप
(form) निर्धारित करती है।
निर्वाचन याचिका का स्वरूप-
निर्वाचन याचिका व्यक्तियों के बीच कोई वाद नहीं होती,
किन्तु वह एक कार्यवाही होती है, जिसमें निर्वाचन-क्षेत्र स्वयं प्रधान पक्षकार
होता है। जगन्नाथ बनाम जसवन्त सिंह, ए०आई०आर०,
1954 एस०सी० 210। याची को याचिका
दाखिल कर देने के पश्चात् उसे वापस लिये जाने की अनुमति नहीं दी जा सकती है।
इन्मती महप्पा बसाप्पा बनाम देसाई बसराज आयप्पा, ए०आई०आर०
1958 एस०सी० 698।
निर्वाचन याचिका का प्रस्तुत किया जाना-
एक अनुप्रमाणित प्रति भी दाखिल की जानी
चाहिए। मूल पर हस्ताक्षर होने से दोष
शुद्ध हो जायगा।
सुब्बा राव बनाम इलेक्शन
ट्राइब्युनल, ए०आई०आर०
1964 एस०सी० 1027।
निर्वाचन याचिका के पक्षकार-
विजयी प्रत्याशी के साथ-साथ प्रत्येक हारे हुए
प्रत्याशी को पक्षकार बनाया जाना जरूरी है।
फैजन अली खाँ बनाम इलेक्शन
ट्राइब्युनल,
1968 ए०एल०जे० 70।
पक्षकारों को पक्ष बनाने में विफलता-
यदि याचिका में जरूरी पक्षकार को पक्ष न बनाये
जाने का दोष हो, तो याचिका निष्फल हो जायगी, और ऐसे दोष को
शुद्ध नहीं किया जा
सकता। के० कामराज नादर बनाम कुन्जु बेवर, ए० आई० आर०
1958 एस०सी० 687।
याचिका की अन्तर्वस्तु-
याचिका में द्वारा 63 (1)
द्वारा यथाविहित सारवान तथ्यों का
संक्षिप्त वृत्त दिया जाना चाहिए।
ऐसा करने में विफलता घातक होगी।
बलवन्त सिंह
बनाम लक्ष्मी नारायण, ए०आई०आर०
1960 एस०सी०
770, भ्रामक याचिका खारिज कर दी गई।
हुकुम सिंह बनाम बनवारी लाल विप्रा, ए०आई०आर०
1965 इला०
522।
याचिका का सत्यापन-
याचिका का सत्यापन सिविल
प्रक्रिया संहिता के उपबन्धों के अनुसार
किया जायगा। सत्यापन में कोई दोष घातक नहीं होता, बल्कि उसको तत्पाश्चात् उपयुक्त
संशोधन करके शुद्ध किया जा सकता है।
मुरारका राधेश्याम रामकुमार बनाम रूपनाथ
राठौर, ए०आई०आर०
1964, एस०सी० 1445।
64. अनुतोष जिसका आवेदक दावा कर सकता है-
आवेदक यह दावा करने के
अतिरिक्त कि समस्त
अथवा किसी सफल उम्मीदवारों का
निर्वाचन शून्य है, इस घोषणा के लिए भी दावा कर सकता
है कि वह स्वयं अथवा अन्य कोई उम्मीदवार यथोचित रूप से
निर्वाचित हुआ है।
65. प्रत्यारोपण-
-
यदि किसी
निर्वाचन आवेदन में किसी
ऐसी घोषणा का दावा किया गया
हो कि निर्वाचित उम्मीदवार से भिन्न कोई उम्मीदवार विधिवत
निर्वाचित हुआ है तो
निर्वाचित उम्मीदवार अथवा अन्य कोई पक्ष यह
सिद्ध करने के लिए साक्ष्य दे सकता है कि
यदि उक्त उम्मीदवार
निर्वाचित हो गया होता और उसके
निर्वाचन के सम्बन्ध में आपत्ति करने
वाला कोई आवेदन प्रस्तुत किया गया होता तो उस उम्मीदवार का
निर्वाचन शून्य हो गया
होताः
किन्तु प्रतिबन्ध यह है कि
निर्वाचित उम्मीदवार अथवा उपर्युक्त कोई अन्य पक्ष
उक्त
साक्ष्य देने का तब तक अधिकारी न होगा जब तक कि उसने यदि वह
निर्वाचन, जिसके सम्बन्ध
में आपत्ति की गयी हो,
-
सभासद का हो तो उस पर
निर्वाचन आवेदन के नोटिस तामील होने के
21 दिन के
भीतर तथा अन्य सभी
दशाओं में
3 दिन के भीतर-निर्वाचन की सुनवाई करने वाले जिला जज
को अपने उक्त आशय का नोटिस न दे दिया गया हो और
द्वारा
79 में विहित प्रतिभूति
(security), यदि कोई हो, न दे दी गई हो।
-
(2) उपधारा (1) में
निर्दिष्ट प्रत्येक नोटिस के साथ
निर्वाचन याचिका की दशा में
धारा 63 द्वारा अपेक्षित विनिर्देशन, विवरण तथा ब्यौरे दिये जायेंगे तथा वे उसी रीति
से हस्ताक्षरित और सत्यापित किये जायेंगे।
66. आवेदन कब खारिज किया जायगा-
यदि कोई
निर्वाचन याचिका इस अधिनियम
द्वारा
निर्दिष्ट
अवधि के भीतर प्रस्तुत न की गयी हो अथवा प्रतिभूति जमा करने के सम्बन्ध में
द्वारा 79
के अधीन बनाये गये उपबन्धों का पालन न किया गया हो अथवा उस पर
निर्दिष्ट समय के
भीतर आवाश्यक मुद्रांक
शुल्क न दिया गया हो तो जिला जज तत्काल उसे अस्वीकार कर
देगा।
67. आवेदन की सुनवाई की
प्रक्रिया-
-
जिला जज किसी
ऐसे निर्वाचन आवेदन की, जो
द्वारा
66
के अधीन खारिज न किया गया हो, सुनवाई करेगा।
-
आवेदन की सुनवाई करने वाला जिला जज
ऐसी प्रक्रिया का अनुसरण करेगा जो
द्वारा 79
के अधीन विहित की जाय।
68. आवेदन का
स्थानान्तरण-
-
निर्वाचन आवेदन से सम्बद्ध किसी पक्ष के प्रार्थनापत्र पर
तथा अन्य पक्षों को नोटिस देने के
पश्चात, और
ऐसे पक्षों की सुनवाई करने के
पश्चात, जो सुनवाई चाहते हैं, अथवा बिना किसी प्रकार की नोटिए दिये हुए स्वतः
किसी समय, हाईकोर्ट-
-
किसी जिला जज के पास विचाराधीन किसी
निर्वाचन आवेदन की सुनवाई के लिए किसी
अन्य जिला जज को स्थानान्तरित कर सकता है, अथवा
-
सुनवाई के लिए
ऐसे आवेदन को उस जिला जज को पुनः स्थानान्तरित कर सकता है,
जिसके यहाँ से वह आवेदन हटा लिया गया था।
-
यदि उपधारा (1) के अधीन कोई
निर्वाचन आवेदन स्थानान्तरित अथवा पुनः
स्थानान्तरित किया गया हो तो वह जिला जज को तत्पाश्चात
उक्त आवेदन की सुनवाई
करेगा, स्थानान्तरण की
आज्ञा में किसी अनुकूल निर्देश के अधीन रहते हुये,
ऐसे
अवस्थान
(point) से सुनवाई आरम्भ कर सकता है जिस अवस्थान से वह स्थानान्तरित
अथवा पुनः स्थानान्तरित किया गया थाः
किन्तु प्रतिबन्ध यह है कि यदि वह उचित समझे तो
ऐसे साक्षियों को, जिसकी पहले
गवाही हो चुकी थी, पुनः बुला सकता है और उनका पुनः परीक्षण कर सकता है।
69. आवेदन पर निर्णय-
यदि सुनवाई के समय आवेदन अन्य प्रकार से अस्वीकृत न हुआ हो तो
जिला जज निर्वाचन आवेदन की सुनवाई हो जाने के
पश्चात्
-
निर्वाचन आवेदन को खारिज करने की; अथवा
-
समस्त अथवा किसी
निर्वाचित उम्मीदवार के
निर्वाचन को शून्य
घोषित करने की; अथवा
-
समस्त अथवा किसी
निर्वाचित उम्मीदवार के
निर्वाचन को शून्य
घोषित करने तथा आवेदक
अथवा अन्य किसी उम्मीदवार को यथाविधि
निर्वाचित
घोषित करने की
आज्ञा देगा।
70. आवेदन का
निस्तारण करते हुए अन्य
आज्ञाओं का दिया जाना-
धारा 69 के अधीन कोई आज्ञा देते समय जिला
जज ऐसी आज्ञा भी देगा, जिसमें
-
यदि आवेदन में यह दोषारोपण है कि
निर्वाचन में कोई भ्राष्टाचार किया गया हो,
तो
-
ऐसी आपत्ति को कि
निर्वाचन में किसी उम्मीदवार अथवा उसके
अभिकर्त्ता
द्वारा अथवा
उनकी सहमति
(consent) से किया गया कोई भ्राष्टाचार
सिद्ध हो गया है या नहीं
सिद्ध
हुआ है और उस भ्राष्टाचरण के प्रकार को; और
-
ऐसे समस्त व्यक्तियों के नामों को, यदि कोई हो, जिनके बारे में सुनवाई के
समय यह सिद्ध हो गया हो कि वे किसी भ्राष्टाचरण के दोषी हैं और
ऐसे आचरण के प्रकार
(nature) को अभिलिखित किया हो; तथा
किन्तु प्रतिबन्ध यह है कि खंड
(क) के उपखंड (5) के अधीन दी गई
आज्ञा में किसी व्यक्ति का नाम तब तक नहीं दिया जायगा जब तक कि
-
उसे जिला जज के समक्ष उपस्थित होने तथा यह कारण दिखाने का नोटिस न दिया गया हो
कि एतदर्थ उसका नाम
क्यों न लिखा जाय; और
-
यदि नोटिस के अनुसार वह उपस्थित होता तो जब तक उसे किसी
ऐसे गवाह से, जिसका
जिला जज ने पहले ही परीक्षण कर लिया हो तथा जिसने उस
व्यक्ति के विरूद्ध साक्ष्य
दिया हो, जिरह करने का और अपनी सफाई में साक्ष्य देने और सुने जाने का अवसर न
दिया गया हो।
71. निर्वाचन को शून्य
घोषित करने के आधार- यदि जिला जज का मत हो कि-
-
अपने निर्वाचन के दिनांक पर कोई
निर्वाचित उम्मीदवार इस अधिनियम के अधीन
उक्त
स्थान की पूर्ति के
निर्मित्त चुने जाने के लिए अर्ह नहीं था अन्यथा अनर्ह था; अथवा
-
निर्वाचित उम्मीदवार अथवा उसके
अभिकर्त्ता अथवा
निर्वाचित उम्मीदवार या उसके
अभिकर्त्ता की सहमति से किसी अन्य
व्यक्ति द्वारा
78 में
निर्दिष्ट कोई भ्राष्टाचार
किया गया है ( अथवा
-
कोई निर्वाचन-पत्र अनुचित रूप से अस्वीकार किया गया है;
-
निर्वाचन फल पर जहाँ तक उसका सम्बन्ध
निर्वाचित उम्मीदवार से है
-
कोई निर्वाचित-पत्र अनुचित रूप से स्वीकार किये जाने से; अथवा
-
निर्वाचित उम्मीदवार के हित में किये गये किसी भ्राष्टाचार से, जिसे
निर्वाचित
उम्मीदवार अथवा उसके
निर्वाचन अभिकर्त्ता अथवा
ऐसे उम्मीदवार या
निर्वाचन अभिकर्त्ता की
सम्मति से कार्य करने वाले किसी
व्यक्ति से भिन्न किसी
व्यक्ति ने किया; अथवा
-
किसी मत के अनुचित रूप से ग्रहण करने, न लेने अथवा अस्वीकार कर देने या किसी
ऐसे मत के ग्रहण करने से जो
शून्य हो ; अथवा
-
इस अधिनियम के उपबन्धों अथवा उसके अधीन बने किन्हीं नियमों अथवा दी गयी
किन्हीं आज्ञाओं का अपालन करने के कारण;
सारवान प्रभाव पड़ा है,
तो जिला जज निर्वाचित उम्मीदवार के
निर्वाचन को शून्य
घोषित करेगा।
72.
आधार जिन पर
निर्वाचित उम्मीदवार से भिन्न कोई उम्मीदवार
निर्वाचित
घोषित किया
जा सकता है यदि किसी
व्यक्ति ने, जिसने आवेदन प्रस्तुत किया है,
निर्वाचित उम्मीदवार के
निर्वाचन पर आपत्ति करने के अलावा इस घोषणा का भी दावा किया है कि वह स्वयं अथवा
अन्य कोई उम्मीदवार विधिवत
निर्वाचित हुआ है और जिला जज का यह मत है कि
-
वस्तुतः आवेदक अथवा
उक्त अन्य उम्मीदवार ने वैध मतों का बहुमत प्राप्त किया है; अथवा
-
यदि निर्वाचित उम्मीदवार को भ्राष्टाचार के कारण प्राप्त हुए मत न मिले होते तो
आवेदक अथवा उक्त अन्य उम्मीदवार ने वैध मतों का बहुमत प्राप्त किया होता;
तो जिला जज निर्वाचित उम्मीदवार के
निर्वाचन को शून्य
घोषित करके यथास्थिति आवेदक
अथवा उक्त अन्य उम्मीदवारों को विधिवत
निर्वाचित
घोषित करेगा।
73.
मतों की समता की
दशा में प्रक्रियायदि किसी
निर्वाचन आवेदन की सुनवाई करते समय यह
प्रतीत हो कि
निर्वाचन में किन्हीं उम्मीदवारों ने बराबर-बराबर मत प्राप्त किये हैं
और उनमें से किसी एक के पक्ष में मत के बढ़ जाने से वह
व्यक्ति निर्वाचित
घोषित किये
जाने का अधिकारी हो जायेगा तो
-
इस अधिनियम के उपबन्धों के अधीन
निर्वाचन अधिकारी
द्वारा किया गया कोई निर्णय,
जहाँ तक वह उक्त उम्मीदवारों के मध्य उपर्युक्त प्रश्न को
निर्धारित करता है, आवेदन के
प्रयोजनों के लिए भी प्रभावी होगा, और
-
जहाँ तक उक्त निर्णय प्रश्न को
निर्धारित न करता हो जिला जज उन उम्मीदवारों के
बीच लाटरी द्वारा निर्णय करेगा और
ऐसी कार्यवाही करेगा मानो जिस उम्मीदवार के पक्ष
में लाटरी निकले उसने एक
अतिरिक्त मत प्राप्त किया है।
74.
-
जिला जज की आज्ञा के
विरूद्ध अपील (1) जिला जज
द्वारा द्वारा
69 अथवा 70 के अधीन दी
गई प्रत्येक आज्ञा के
विरूद्ध
आज्ञा के दिनांक से तीस दिन के भीतर हाईकोर्ट को अपील
हो सकेगीः
किन्तु प्रतिबन्ध यह है कि हाईकोर्ट उपर्युक्त
तीस दिन की अवधि समाप्त होने के पश्चात भी अपील ग्रहण कर सकता है यदि उसका समाधान
हो जाय कि अपीलकर्त्ता पर्याप्त
कारणवश इस अवधि के भीतर अपील नहीं प्रस्तुत कर सका।
-
प्रत्येक व्यक्ति, जो उपधारा
(1) के अधीन अपील प्रस्तुत करे अपील के स्मृति-पत्र
के साथ सरकारी खजाने की
ऐसी रसीद नत्थी करेगा जो यह प्रकट करती हो कि उसके
द्वारा
किसी सरकारी खजाने अथवा स्टेट बैंक ऑफ इंडिया
में हाईकोर्ट के नाम अपील के वाद-व्यय की प्रतिभूति के रूप में पाँच सौ रूपये की
धनराशि जमा की गई है।
-
इस नियम के उपबन्धों के अधीन रहते हुए हाईकोर्ट को इस अध्याय के अधीन अपील
के सम्बन्ध में वही अधिकार, क्षेत्राधिकार तथा प्राधिकार होंगे तथा वह उसी
प्रक्रिया का
अनुसरण करेगा मानो कि वह उसके स्थानिक दीवानी अपील सम्बन्धी क्षेत्राधिकार के
अन्तर्गत स्थित किसी दीवानी न्यायालय
द्वारा पारित मूल
डिग्री से प्रोद्भूत अपील होः
किन्तु प्रतिबन्ध यह है कि इस
द्वारा के अधीन प्रत्येक अपील दो से अन्यून जजों की
बेंच द्वारा सुनी जायगी।
-
प्रत्येक अपील यथासंभव शीघ्रता से निर्णीत की जायगी और यह प्रयास किया जायगा
कि हाईकोर्ट में अपील का स्मृति-पत्र प्रस्तुत किये जाने के तीन महीने के भीतर अपील
अन्तिम रूप से समाप्त हो जाय।
-
हाईकोर्ट का निबन्धक अपील पर दी गयी हाईकोर्ट की
आज्ञा की एक प्रति राज्य
सरकार को सूचनार्थ भेजेगा।
-
जब धारा 69 के खंड
(ख) के अधीन आज्ञा के
विरूद्ध कोई अपील की जाय तो
हाईकोर्ट पर्याप्त कारण प्रदाश्रित करने पर उस
आज्ञा की कार्यान्विति स्थगित कर सकता है,
जिसके विरूद्ध अपील की गई हो तथा
ऐसी दशा में यह समझा जायेगा कि
द्वारा 77 के
अधीन आज्ञा कभी प्रभावी नहीं हुई तथा जब तक अपील खारिज न कर दी जाय,
आज्ञा प्रभावित न
हो सकेगी।
75. आज्ञाओं तथा निर्णयों की अंतिमता-
धारा 74 के अधीन अपील होने पर हाईकोर्ट का निर्णय तथा केवल
ऐसे निर्णय के अधीन रहते हुए ही
द्वारा 69 अथवा
70 के अधीन दी हुई
जिला जज की आज्ञा अन्तिम एवं निश्चायक होगी।
76. आज्ञा का संवहन-
धारा 69 तथा
70 के अधीन दी गयी अपनी
आज्ञाओं की घोषणा करने के बाद
जिला जज उनकी एक प्रति राज्य सरकार को भेजेगा।
77. आज्ञा का प्रभावी होना-
धारा 69 अथवा
70 के अधीन जिला जज
द्वारा दी गयी कोई
आज्ञा उस दिन
के, जिस पर उसकी घोषणा की गयी हो, बाद वाले दिनांक से प्रभावी होगी।
78. भ्रष्टाचार-
इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिये निम्नलिखित भ्रष्टाचार समझे
जायेंगेः
-
घूस देना, अर्थात उम्मीदवार या उसके
अभिकर्त्ता अथवा किसी अन्य
व्यक्ति द्वारा किसी भी
व्यक्ति को कोई परितोषण
(gratification) का दान, समुपस्थान अथवा उसके लिए वचन
देना जिसका उद्देश्य प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से
-
किसी व्यक्ति को किसी
निर्वाचन में उम्मीदवार के रूप में खड़े होने या न होने के
लिए अथवा अपनी उम्मीदवारी वापस लेने के लिये, अथवा
निर्वाचन लड़ने से हट जाने के लिये अथवा
-
किसी निर्वाचक को
निर्वाचन में मत देने अथवा न देने के लिये; प्रेरित करना हो, अथवा जो
-
किसी व्यक्ति को, जो इस प्रकार उम्मीदवार के रूप में खड़े होने या न खड़े होने के
लिए, अथवा अपनी उम्मीदवारी वापस लेने के लिये अथवा चुनाव लड़ने से हट जाने के लिए
अथवा
-
किसी निर्वाचक को मत देने के लिये अथवा न देने के लिए पुरस्कार के रूप में हो।
स्पष्टीकरण-
इस खंड के प्रयोजनों के लिए
शब्द परितोषण (gratification)
ऐसी
परिपुष्टियों तक ही सीमित नहीं है जो धन के रूप में हों अथवा जिन्हें धन के रूप
में व्यक्त किया जा सके, अपितु इसके अन्तर्गत सभी प्रकार के मनोरंजन तथा
पुरस्कारार्थ सभी प्रकार के नियोजन भी सम्मिलित हैं ;
-
अनुचित प्रभाव डलना अर्थात किसी उम्मीदवार या उसके
अभिकर्त्ता अथवा किसी अन्य
व्यक्ति द्वारा किसी निर्वाचन में
निर्वाचन सम्बन्धी किसी अधिकार के स्वतंत्र प्रयोग में
प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से हस्तक्षेप करना अथवा हस्तक्षेप करने का प्रयत्न
करनाः
किन्तु प्रतिबन्ध यह है कि
-
इस खंड के उपबन्धों की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना उनमें उल्लिखित
कोई व्यक्ति, जो
-
किसी उम्मीदवार को अथवा किसी
निर्वाचक को अथवा किसी
ऐसे व्यक्ति को, जिसमें वह
उम्मीदवार अथवा
निर्वाचक अभिरूचि रखता हो, किसी भी प्रकार की हानि पहुँचाने की धमकी
देता है, जिसमें सामाजिक बहिष्कार
(social ostracism) और किसी जाति अथवा
सम्प्रदाय से अलग कर देना भी सम्मिलित है
अथवा
-
किसी उम्मीदवार को अथवा
निर्वाचक को
ऐसा विश्वास करने के लिए प्रेरित करता है
अथवा प्रेरित करने का प्रयत्न करता है कि वह अथवा अन्य कोई
व्यक्ति, जिसमें वह
अभिरूचि रखता है दैवी प्रकोप अथवा आध्यात्मिक अपराध
(divine displeasure or spiritual cesure) का भागी होगा या बना दिया जायगा
तो यह समझा जायगा कि वह
व्यक्ति इस खंड के अर्थ में
उक्त उम्मीदवार अथवा
निर्वाचक के
निर्वाचन सम्बन्धी अधिकारों
के स्वतंत्र प्रयोग में हस्तक्षेप कर रहा है।
-
किसी सार्वजनिक नीति की घोषणा अथवा किसी सार्वजनिक कार्यवाही का वचन अथवा किसी
ऐसे विधिक अधिकार का प्रयोग, जिसका उद्देश्य निर्वाचन सम्बन्धी अधिकारों में
हस्तक्षेप करना न हो, इस खंड के अथ्र में हस्तक्षेप नहीं समझे जायेंगे।
-
जाति, मूलवंश,
समाज अथवा धर्म अथवा प्रथा के आधार पर उम्मीदवार अथवा उसके
अभिकर्त्ता अथवा अन्य किसी
व्यक्ति द्वारा मत देने अथवा मत देने के लिए
क्रमबद्ध अपील अथवा
उम्मीदवार के
निर्वाचन की सफलता को समुन्नत करने के लक्ष्य से धार्मिक चिन्हों के
प्रति अपील अथवा राष्ट्रीय चिन्हों जैसे कि राष्ट्रध्वज अथवा राष्ट्रप्रतीक का प्रयोग
अथवा उनके प्रति अपील।
-
किसी उम्मीदवार या उसके
अभिकर्त्ता अथवा किसी अन्य
व्यक्ति द्वारा किसी उम्मीदवार की
उम्मीदवारी अथवा उम्मीदवारी की वापसी अथवा चुनाव लड़ने से हटने के सम्बन्ध में
ऐसे
तथ्य के प्रकथन का प्रकाशन जो असत्य हो, और जिन्हें या तो वह असत्य समझता हो, अथवा
जिसकी सत्यता में उसे विश्वास न हो और जो उस उम्मीदवार के चुनाव के सुयोगों पर
प्रतिकूल प्रभाव डलने के लिए युक्तितः आयोजित हो।
-
किसी उम्मीदवार या उसके
अभिकर्त्ता का किसी
व्यक्ति द्वारा किसी अन्य
व्यक्ति के नाम
से वह चाहे जीवित हो या मृत अथवा किसी बनावटी नाम से अथवा अपने ही नाम से जब कि वह
व्यक्ति उसी या दूसरे कक्ष में पहले ही मतदान कर चुकने के फलस्वरूप मत देने का
अधिकारी न हो, शलाका-पत्र के लिए प्रार्थना करवाना अथवा प्रार्थना करने में
प्रोत्साहन देने अथवा
प्रार्थना कराने का प्रयत्न करना।
-
किसी उम्मीदवार या उसके अभिकर्त्ता अथवा किसी अन्य व्यक्ति द्वारा स्वयं
उम्मीदवार के अथवा उसके परिजनों अथवा अभिकर्त्ता से भिन्न किसी निर्वाचक की द्वारा
46
के अधीन प्रचारित आज्ञा द्वारा व्यवस्थित मतदान-स्थल तक अथवा वापस ले जाने के
लिये धनराशि देकर अथवा अन्य या किसी वाहन अथवा यान का किराये पर लेना या अन्यथा
प्राप्त करना
किन्तु प्रतिबन्ध यह है कि किसी एक
निर्वाचन
द्वारा अथवा कई निर्वाचकों
द्वारा संयुक्त लागत
पर उसे या उन्हें किसी मतदान-स्थल तक अथवा मतदान के लिये निश्चित स्थान तक और वापस
लाने-ले जाने के प्रयोजन से किसी वाहन या यान का किराये पर लिया जाना इस खंड के
प्रयोजन के निर्मित्त भ्रष्टाचार न होगा, यदि इस प्रकार किराये पर लिया गया वाहन या
यान ऐसा वाहन या यान हो, जो यांत्रिक
शक्ति द्वारा परिचालित न होता होः
और प्रतिबन्ध यह भी है कि किसी
निर्वाचक द्वारा अपनी लागत पर किसी मतदान-स्थल तक अथवा
मतदान के लिये निश्चित स्थान तक जाने और वापस आने के लिये किसी सार्वजनिक परिवहन
के वाहन अथवा यान के अथवा किसी टैम या रेल के
डिब्बे का प्रयोग इस खंड के प्रयोजन
के निर्मित्त भ्रष्टाचरण न समझा जायगा।
-स्पष्टीकरण-
इस खंड में पद वाहन से तात्पर्य है कोई
ऐसा वाहन, जो सड़क परिवहन में
प्रयुक्त किया जाय अथवा प्रयोग किये जाने के योग्य हो, चाहे वह यांत्रिक
शक्ति द्वारा
परिचालित होता हो, अथवा अन्य किसी प्रकार से अथवा चाहे वह अन्य वाहनों को खींचने के
लिये अथवा अन्य किसी प्रकार से प्रयुक्त होता हो।
-
किसी उम्मीदवार अथवा उसके
अभिकर्त्ता अथवा किसी अन्य
व्यक्ति द्वारा सरकार की सेवा
में संलग्न तथा निम्नलिखित
वर्गों से सम्बद्ध किसी भी
व्यक्ति से उस उम्मीदवार के
निर्वाचन की सफलता की संभावना को समुन्नत करने के लिये
(मत देने से भिन्न) अन्य
कोई सहायता प्राप्त करने या प्राप्त करवाने अथवा प्राप्त करने या प्राप्त करवाने
के लिये प्रेरित अथवा प्रयास करना
-
गजटेड अधिकारी ;
-
वेतनभोगी जज और
मजिस्ट्रेट ;
-
भारत संघ की साशस्त्र सेनाओं के सदस्य ;
-
पुलिस दल के सदस्य ;
-
आबकारी विभाग के अधिकारी ;
-
माल विभाग के अधिकारीगण, जिनके अन्तर्गत गाँव के एकाउन्टेन्ट जैसे पटवारी
लेखपाल, तलती, कारनाम तथा उसके समस्त अधिकारीगण किन्तु इसके अन्तर्गत अन्य ग्राम्य
अधिकारीगण नहीं हैं, तथा
-
राज्य सरकार की सेवा में संलग्न अन्य
ऐसे व्यक्तियों के वर्ग जो नियत किये
जायँ।
टिप्पणियाँ
अनुचित प्रभाव अनुचित प्रभाव को
सिद्ध करने के लिए किसी
व्यक्ति को यह
सिद्ध करना होगा
कि विजयी प्रत्याशी
द्वारा अनुचित प्रभाव डलने के कारण उसके प्रत्याशी की चुनाव करने
की स्वतंत्रता प्रभावित हुई थी।
[लाल सिंह केसरी सिंह बनाम बल्लभदास शंकरलाल,
ए०आई०आर० 1967
गुजरात 62
ऐसे किसी मामले में यह जरूरी नहीं होता कि प्रभावाधीन
रखा गया निर्वाचक शिक्षित नहीं था
(तदैव)। अनुचित दबाव का वास्तविक प्रभाव
सिद्ध
किया जाना होगा।
[रामदयाल बनाम सन्तलाल, ए०आई०आर०
1959 एस०सी० 855] यह एक
ऐसा
मामला था जिसमें दैनिक अरिष्ट के अभिकथन
द्वारा अनुचित प्रभाव डला गया था।
धर्म के आधार पर किया गया अनुरोध अनुचित प्रभाव की परिभाषा में आता है।
[शुभनाथ
देवगम बनाम रत्न नारायण, ए०आई०आर०
1960 एस०सी० 148]।
मिथ्या कथन का प्रकाशन आपराधिक मनःस्थिति यह
सिद्ध करना जरूरी होगा कि प्रत्याशी या
उसके अभिकर्त्ता ने तथ्य के मिथ्या कथन का प्रकाशन किया।
[डॉ० दलजीत सिंह बनाम
ज्ञानी
करतार सिंह, ए०आई०आर०
1966 एस०सी० 773]।
यह सिद्ध करना होगा कि प्रत्याशी या उसका
अभिकर्त्ता कथन का रचयिता (नजीवत) था।
[शिव प्रताप सिंह बनाम राम प्रताप, ए०आई०आर०
1965 एस०सी० 677]।
यह अभिकथन कि किसी प्रत्याशी ने पिछ्ले निर्वाचन में द्रव्य प्राप्त करके अपनी
उम्मीदवारी वापस ले ली थी,
[मारानन्द बनाम बृजमोहन लाल शर्मा, ए०आई०आर०
1967 एस०सी० 808]।
79.
निर्वाचनों से
सम्बद्ध विवादों के
निर्णय संबंधी नियम राज्य सरकार निम्नलिखित
विषयों के संबंध में नियम बना सकती है
-
निर्वाचन आवेदनों की सुनवाई करने वाले जिला जजों के लिये कर्मचारियों की
नियुक्त तथा पारिश्रमिक ;
-
निर्वाचन आवेदनों की समाप्ति और वापसी ;
-
अनुपस्थिति अथवा असंचालन अथवा न्यायालय की
आज्ञाओं के तथा इस अधिनियम के उपबन्धों
और तदन्तर्गत दी गयी
आज्ञाओं के अपालन के फलस्वरूप
निर्वाचन आवेदनों को खारिज करना ;
-
आवेदनों की सुनवाई की
प्रक्रिया ;
निर्वाचन आवेदन की सुनवाई करने वाले जिला जज के अधिकार ;
-
सुनवाई का स्थान ;
-
प्रतिभूति एवं अतिरिक्त प्रतिभूति जमा करना ;
-
जमा की गयी प्रतिभूति की वापसी अथवा जब्ती ;
-
द्वारा 70 के अधीन प्रदत्त (awarded) व्यय की प्राप्ति ;
-
पक्षों को स्थानापन्न करना ;
-
निर्वाचन आवेदनों के निर्णयाभिलेखों का रखा जाना तथा छाँटा जाना ;
-
अन्य विषय, जिनकी राज्य सरकार की राय में व्यवस्था करना आवश्यक हो।
80.
-
निर्वाचन अपराधों तथा भ्रष्टाचारों के कारण अर्हताएँ (1)
इंडियन पेनल कोड,
1860 की धारा
171-ई या
171-एफ के अधीन कारावास दंड्य अपराध तथा रिप्रीजेंटेशन आफ
दी पीपुल ऐक्ट,
1951, जैसा
कि वह इस अधिनियम के अधीन
निर्वाचनों पर
धारा
48
द्वारा
प्रवृत्त किया गया हो, की
धारा
135 अथवा द्वारा
136 के अधीन दंड्य अपराध निगम की सदस्यता के लिये अनर्हता उत्पन्न करेंगे।
-
द्वारा 78
में
निर्दिष्ट भ्रष्टाचार
निगम की सदस्यता के लिये अनर्हता
उत्पन्न करेंगे।
-
अनर्हता की अवधि उपधारा (1) के अधीन अनर्हता के सम्बन्ध में दोष-सिद्धि के
दिनांक के आरम्भ से तथा उपधारा
(2) के अधीन अनर्हता के सम्बन्ध में जिला जज
द्वारा धारा
70 के अधीन दी गयी उपपत्ति
(पिदकपदह) के द्वारा
77 के अधीन प्रभावी होने के
दिनांक से 5 वर्ष की होगी।
कुछ अन्य विषय
81.
शपथ लेने अथवा
प्रतिज्ञा न करने से पूर्व अथवा अर्हन होने या अनर्ह होने की दशा
में स्थान ग्रहण करने या मत देने पर दंड
यदि कोई व्यक्ति निगम के नगर प्रमुख,
उपनगर प्रमुख अथवा सदस्य के रूप में
निगम के किसी अधिवेशन या उसकी किसी समिति
की बैठक में धारा
85 की
उपधारा
(1) की अपेक्षाओं का अनुपालन किये बिना, अथवा यह
जानते हुए कि वह यथास्थिति नगर प्रमुख, उपनगर प्रमुख या सभासद होने के
लिये अर्ह नहीं है अथवा अनर्ह है, स्थान ग्रहण करता है अथवा मत देता है तो वह
प्रत्येक उस दिन के पहले जिस पर वह
उक्त प्रकार से स्थान ग्रहण करता है अथवा मत देता
है, दंड रूवरूप
50 रू० जुर्माना देने का भागी होगा, जो राज्य को देय ऋण के रूप में
वसूल किया जायगा।
82.
अनर्हता से
सम्बद्ध प्रश्नों का राज्य सरकार
द्वारा निर्णय यदि यह प्रश्न उठ खड़ा
हो कि निगम का कोई सदस्य
द्वारा 25 में उल्लिखित किसी अनर्हता से ग्रस्त है
अथवा नहीं, तो यह प्रश्न निर्णयार्थ राज्य सरकार को विहित रीति से
निर्दिष्ट कर
दिया जायगा और इस सम्बन्ध में राज्य सरकार का
निर्णय अन्तिम होगा।
83.
सदस्यों का हटाया जाना (1) राज्य सरकार
निगम अथवा उसकी किसी समिति के किसी
सदस्य को निम्नलिखित किसी भी आधार पर हटा सकती है
-
कि उसने द्वारा
25
के खंड
(ङ) में निर्दिष्ट विषय से भिन्न किसी ऐसे विषय
के सम्बन्ध में, जिसमें प्रत्यक्षतः अथवा अप्रत्यक्षतः उसका कोई निजी स्वार्थ हो
अथवा जिसमें वह अपने वादग्राहक
(client), निर्देष्टा
(princ) अथवा अन्य किसी
व्यक्ति की ओर से वृत्तिक रूप से
(professionally) अभिरूचि रखता हो। यथा सभासद या किसी समिति के सदस्य के रूप में मत देकर अथवा उनकी चर्चाओं में भाग लेकर
कार्य किया हो;
-
कि वह उक्त सदस्य के रूप में अपने कर्तव्यपालन में शारीरिक अथवा मस्तिष्क
रूप में असमर्थ हो गया है;
-
कि उक्त सदस्य के रूप में अपने कर्तव्य के पालन के घोर दुराचार का दोषी रहा
हैः
-
किन्तु प्रतिबन्ध यह है कि इस
द्वारा के अधीन हटाये जाने की
आज्ञा राज्य सरकार
द्वारा न दी
जायगी जब तक कि
आज्ञा से सम्बद्ध सभासद अथवा समिति के सदस्य को, इस बात का कारण
बताने का उचित अवसर न दे दिया गया हो कि उसे
ऐसी आज्ञा क्यों न दी जाय।
-
किसी व्यक्ति को सरकारी गजट में
विज्ञप्ति प्रकाशित करके ही हटाया जायगा तथा यह
हटाया जाना विज्ञप्ति के प्रकाशन के दिनांक से प्रभावी होगा।
-
राज्य सरकार किसी सदस्य को जो राज्य सरकार की
आज्ञा द्वारा निर्दिष्ट किये गये किसी
भयंकर संसर्गजन्य रोगों में किसी से ग्रस्त हो, निगम अथवा उसकी किसी
समिति, संयुक्त समिति अथवा उपसमिति के अधिवेशन में उपस्थित न होने का निर्देश दे
सकती है तथा कोई सदस्य जिसे, इस प्रकार निर्देश
दिया गया हो, निगम या उसकी
समिति, संयुक्त समिति अथवा उपसमिति के अधिवेशन में उपस्थित होने का तब तक अधिकारी न
होगा जब तक कि राज्य सरकार के संतोषानुसार उसके इस बात का प्रमाण देने पर कि वह उस
रोग से मुक्त हो गया है, राज्य सरकार निदेश वापस नहीं ले लेती;
-
कोई भी वह व्यक्ति जो उपधारा
(1) के अधीन निगम की सदस्यता से हटाया जा
चुका हो, हटाये जाने के दिनांक से
4
वर्ष तक के लिये निगम के सदस्य के रूप में
निर्वाचित होने अथवा सदस्य होने से अनर्ह रहेगा, तथा कोई भी
व्यक्ति, जो निगम की
किसी समिति से हटाया गया हो, हटाये जाने के दिनांक से
4
वर्ष तक के लिये उस समिति
के सदस्य के रूप में
निर्वाचित होने अथवा उसका सदस्य होने के लिये अनर्ह रहेगाः
किन्तु प्रतिबन्ध यह है कि राज्य सरकार किसी भी समय इस अनर्हता को हटाने की
आज्ञा दे
सकती है।
84.
85. सभासदों, इत्यादि
द्वारा निष्ठा की शपथ लिया जाना-
-
इंडियन ओथ्स
ऐक्ट, 1873 में किसी बात के होते हुये भी प्रायः प्रत्येक
व्यक्ति, जो सभासद
निर्वाचित हो अथवा विकास समिति के सदस्य के रूप में संयोजित हो तथा
प्रत्येक व्यक्ति, जो नगर प्रमुख
निर्वाचित हो गया हो, अपना स्थान ग्रहण करने के पूर्व
निम्नलिखित रूप से
शपथ लेगा अथवा प्रतिज्ञान करेगा, अर्थातः
-
मैं . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . क, ख, जो निगम का सभासद/नगर प्रमुख/निर्वाचित, विकास समिति का सदस्य संयोजित हुआ
हूँ, ईश्वर की शपथ
लेता हूँ/सत्य निष्ठा से प्रतिज्ञान करता
हूं कि मैं विधि
द्वारा स्थापित भारत के
संविधान के प्रति
श्रृद्धा और
निष्ठा रखूंगा, मैं भारत की प्रभुता तथा
अखण्डता को बनाये रखूंगा और जिस पद को मैं ग्रहण करने वाला
हूं उसके कर्तव्यों का
श्रद्धापूर्वक
पालन करूँगा।
(1-क) निगम के
धारा 9 के
अधीन संगठन या द्वारा 538 के
अधीन पुर्नसंगठन हो
जाने के सात दिन के भीतर मुख्य नगर अधिकारी निर्वाचित घोषित किये
गये नगर प्रमुख और सभासद, का एक अधिवेशन बुलायेगा।
डिवीजन का कमिश्नर और
उसकी अनुपस्थिति में जिला
मजिस्ट्रेट नगर-प्रमुख को
शपथ दिलायेगा या प्रतिज्ञान करायेगा
और तत्पश्चात नगर प्रमुख
ऐसे सभासदों को, जो उपस्थित हों,
शपथ
दिलायेगा या प्रतिज्ञान करायेगा।
-
कोई व्यक्ति जो सभासद या नगर प्रमुख निर्वाचित हो चुका हो अथवा हो
विकास समिति का कोई संयोजित सदस्य हो, अपनी पदावधि के प्रारम्भ से तीन महीने के
भीतर या उक्त दिनांक के पश्चात आयोजित निगम के प्रथम तीन अधिवेशनों में से किसी एक
में, दोनों में से जो भी परवर्ती हो, उपधारा
(1) में निर्दिष्ट तथा
एतदर्थ अपेक्षित
शपथ अथवा प्रतिज्ञान न करे तो वह अपने पद आसीन रहेगा और उसका पद
रिक्त
समझा जायेगा।
-
कोई भी व्यक्ति, जिससे उपधारा (1) के अधीन शपथ लेने अथवा प्रतिज्ञान करने की
अपेक्षा की गई है, निगम के किसी अधिवेशन में अथवा विकास-समिति का सदस्य संयोजित
होने की दशा में उस समिति के किसी अधिवेशन में उस समय तक न हो तो स्थान ग्रहण करेगा
और न यथास्थिति सभासद, अथवा नगर प्रमुख अथवा विकास समिति के सदस्य के
रूप में कोई कार्य ही करेगा जब तक उसने उपधारा
(1) में निर्दिष्ट शपथ
न ली हो अथवा प्रतिज्ञान न किया हो।
86. निर्वाचन व्यय-
-
किसी नगर की निर्वाचन सूचियों को तैयार करने तथा उनके पुनरीक्षण तथा उस नगर के लिए इस
अधिनियम के अधीन संचालित
निर्वाचनों के सम्बन्ध में किए गए समस्त व्यय, जब तक कि
राज्य सरकार अन्यथा निदेश न दे, राज्य सरकार
द्वारा निर्दिष्ट रीति से और उसके
द्वारा
निर्दिष्ट आयति (मगजमदज) पर्यन्त निगम पर भारित होंगे
तथा उन्हें निगम से वसूल किया जा सकेगा।
-
निर्वाचन अधिकारी अथवा
निर्वाचन का संचालन करने का उत्तरदायी कोई पदाधिकारी
निगम को यह आदेश दे सकता है कि वह
ऐसी धनराशि दे जो उस निर्वाचन के संचालन के
लिए आवाश्यक हो और तत्पश्चात निगम निर्वाचन अधिकारी अथवा अन्य संबद्ध पदाधिकारी
को उक्त धनराशि उपलब्ध करायेगा।
87.
-
राज्य सरकार का अधिकार राज्य सरकार विहित किये जाने वाले विषयों के सम्बन्ध
में, किन्तु जो अधिनियम में अथवा
आज्ञा
द्वारा विहित नहीं किए गए हैं, नियम बना सकती है।
-
पूर्वोक्त अधिकारों की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना इन नियमों में
निम्नलिखित की व्यवस्था की जा सकती है
-
नगर प्रमुख, उपनगर प्रमुख या सभासद के निर्वाचन तथा नगर प्रमुख,
उपनगर-प्रमुख अथवा सभासद के स्थान की रिक्ति की विज्ञप्ति की रीति;
-
कार्यकारिणी समिति, विकास-समिति तथा
द्वारा 5
के खंड
(ङ) के अधीन संगठित
समितियों के सदस्यों के
निर्वाचन की तथा विकास-समिति के सदस्यों के संयोजन की रीति ;
-
कार्यकारिणी, समिति तथा विकास समिति के उपसभापति के
निर्वाचन की तथा
धारा 5 के
खंड (ङ) के अधीन
संगठित समितियों के सभापति तथा उपसभापति के
निर्वाचन की रीति;
-
मुख्य नगराधिकारी के अधिकतम वेतन और भत्ते;
-
किसी सदस्य की अनर्हता के सम्बन्ध में
धारा 82 के अधीन किसी प्रश्न के
प्रतिप्रेषण (तममितमदबम) की रीति;
-
यह जानने की
प्रक्रिया कि
धारा 25 तथा
83 के प्रयोजनों के निमित्त कोई सदस्य
किसी भयानक रोग से पीड़ित हैं या नहीं, और
-
द्वारा 85 के अधीन
शपथ ग्रहण करने से
सम्बद्ध
विषय।
उ०प्र० अधिनियम सं०
12
सन 1994
द्वारा प्रतिस्थापित
उ०प्र० अधिनियम सं०
26
सन 1995
द्वारा द्वारा
4
प्रतिस्थापित की गई
उ०प्र० अधिनियम सं०
12
सन 1994
द्वारा अन्तः
स्थापित
उ०प्र० अधिनियम सं०
41, सन 1976
द्वारा बढाया गया
उ०प्र० अधिनियम सं०
12
सन 1994
की
द्वारा 9
मूल अधिनियम की
द्वारा 6
प्रतिस्थापित
की गयी
उ०प्र० अधिनियम सं०
26
सन 1995
द्वारा मूल अधिनियम की
द्वारा 6-क प्रतिस्थापित की
गई। इसके पूर्व
द्वारा 6-क को उ०प्र० अधिनियम सं०
12
सन 1994
की
द्वारा 9
द्वारा
अन्तःस्थापित किया गया था
उ०प्र० अधिनियम सं०
12
सन 1994
की
द्वारा 10
द्वारा मूल अधिनियम की
द्वारा 7
प्रतिस्थापित की गयी
उ०प्र० अधिनियम सं०
26
सन 1995
की
द्वारा 6(क)
द्वारा प्रतिस्थापित
उ०प्र० अधिनियम सं०
26
सन 1995
द्वारा अन्तःस्थापित
उ०प्र० अधिनियम सं०
26
सन
1995
द्वारा उपधारा (2) निकाल दी गयी
उपरोक्त अधिनियम
द्वारा शब्द उपधारा (1) और (2) के स्थान पर प्रतिस्थापित
उ०प्र० अधिनियम सं०
12
सन
1994
की
द्वारा
11
द्वारा मूल अधिनियम की
द्वारा
8
प्रतिस्थापित की गयी।
उ०प्र० अधिनियम सं०
12
सन 1994
की
द्वारा 12
द्वारा द्वारा
8-क निकाल दी गयी
उ०प्र० अधिनियम सं०
3
सन 1983
द्वारा बढायी गयी
उ०प्र० अधिनियम सं०
12
सन
1994
द्वारा प्रतिस्थापित
उ०प्र० अधिनियम सं०
26
सन 1995
द्वारा प्रतिस्थापित
उ०प्र० अधिनियम सं०
26
सन
1995
द्वारा शब्द इस अधिनियम के अधीन के स्थान पर
प्रतिस्थापित
उ०प्र० अधिनियम सं०
12
सन 1994
की
द्वारा 72
द्वारा नगरपालिका बोर्ड
के स्थान पर
प्रतिस्थापित
उ०प्र० अधिनियम सं०
12
सन
1994
द्वारा अन्तःस्थापित
उ०प्र० अधिनियम सं०
12
सन 1977
द्वारा कूछ शब्द निकाले गये
उ०प्र० अधिनियम, सं० 12
सन 1994
द्वारा प्रतिस्थापित
उ०प्र० अधिनियम, सं० 12
सन 1994
द्वारा निकाला गया
उ०प्र० अधिनियम, सं०
12
सन 1994
द्वारा उपधारा (2) निकाली गयी
उ०प्र० अधिनियम, सं०
12
सन 1994
की
द्वारा 15
द्वारा 11-क जोड़ी गयी इसके पूर्व
द्वारा 11-क उ०प्र० अधिनियम सं.
17
सन 1982
द्वारा निकाल दी गई थी
उ०प्र० अधिनियम, सं०
12
सन
1994
द्वारा प्रतिस्थापित
उ०प्र० अधिनियम, सं०
7
सन 2000
द्वारा उपधारा (1) प्रतिस्थापित
(1-10-1999
से प्रभावी)
उ०प्र० अधिनियम, सं० 41 सन 1976
द्वारा निकाली गयी
उ०प्र० अधिनियम, सं०
12
सन 1994
द्वारा शब्द नगर प्रमुख और निकाला गया
उ०प्र० अधिनियम, सं०
12
सन
1994
द्वारा शब्द द्वारा
9
के प्रयोजनों के
निर्मित्त
और नगर प्रमुख और निकाला गया
उ०प्र० अधिनियम, सं०
12
सन
1994
द्वारा शब्द द्वारा
12
में के स्थान पर
प्रतिस्थापित
उ०प्र० अधिनियम, सं०
12
सन 1994द्वारा प्रतिस्थापित
उ०प्र० अधिनियम, सं०
12
सन
1994
की
द्वारा
20
द्वारा द्वारा
15-क निकाली गयी
उ०प्र० अधिनियम, सं० 12
सन 1994
की द्वारा 20
द्वारा शब्द ''उप निकाला गया।
उ०प्र० अधिनियम सं० 17 सन 1982
द्वारा शब्द ''दो तिहाई से के स्थान पर रखे गये।
उ०प्र० अधिनियम सं०
12
सन
1994
द्वारा प्रतिस्थापित।
उ०प्र० अधिनियम सं०
12
सन 1994
द्वारा शब्द ''नगर प्रमुख के स्थान पर
प्रतिस्थापित।
उ०प्र० अधिनियम सं० 12 सन 1994
द्वारा निकाली गयी।
उ०प्र० अधिनियम सं०
12
सन
1994
द्वारा शब्द नगर प्रमुख के स्थान पर
प्रतिस्थापित।
उ०प्र० अधिनियम सं०
12
सन
1994
द्वारा शब्द उप निकाला गया।
उ०प्र० अधिनियम सं०
12
सन
1994
द्वारा प्रतिस्थापित।
उ०प्र० अधिनियम सं०
8
सन 1998
द्वारा शब्द आधे से अधिक से बहुमत के स्थान पर
रखे गये (13-11-1997
से प्रभावी)
उ०प्र० अधिनियम सं० 17
सन 1982
द्वारा निकाली गयी।
उ०प्र० अधिनियम सं०
26
सन
1995
द्वारा उपधारा (1) प्रतिस्थापित।
उ०प्र० अधिनियम सं०
12
सन 1994
द्वारा प्रतिस्थापित।
उ०प्र० अधिनियम सं० 21 सन 1964
द्वारा 4 द्वारा प्रतिस्थापित।
उ०प्र० अधिनियम सं०
12
सन 1994
द्वारा प्रतिस्थापित।
उ०प्र० अधिनियम सं०
12
सन 1997
द्वारा मूल अधिनियम की
द्वारा 20, 21
और 22
निकाल
दी गयी।
उ०प्र० अधिनियम सं०
12
सन
1994
द्वारा शब्द
विशिष्ट सदस्यों तथा निकाले गये।
उ०प्र० अधिनियम सं० 12 सन 1997
द्वारा प्रतिस्थापित।
उ०प्र० अधिनियम सं०
15
सन 1983
द्वारा शब्द पाँच
वर्ष के स्थान पर रखा गया।
उ०प्र० अधिनियम सं०
15
सन 1994
द्वारा प्रतिस्थापित।
उ०प्र० अधिनियम सं० 12
सन 1974
की द्वारा 24
द्वारा शब्द कोढक़ग्रस्त है अथवा निकाले गए
उ०प्र० अधिनियम सं०
12
सन 1994
द्वारा शब्द सिविल सर्जन के स्थान पर
प्रतिस्थापित
उ०प्र० अधिनियम सं०
26
सन
1995
द्वारा प्रतिस्थापित
उ०प्र० अधिनियम सं०
12
सन 1994
द्वारा शब्द नगर पालिका के स्थान पर
प्रतिस्थापित
उ०प्र० अधिनियम सं०
12
सन 1994
द्वारा जोड़ा गया
उ०प्र० अधिनियम सं० 12
सन 1977
द्वारा निकाला गया
उ०प्र० अधिनियम सं०
12
सन
1977
द्वारा निकाला गया।
उ०प्र० अधिनियम सं० 12
सन 1994
द्वारा प्रतिस्थापित।
विस्तृत जानकारी के लिये उ०प्र० सहकारी समिति अधिनियम एवं नियमावली
द्वारा ड० एच़एऩ
ञिपाठी का अवलोकन करें।
उ०प्र० अधिनियम सं०
12 सन
1977 द्वारा प्रतिस्थापित
उ०प्र० अधिनियम सं०
12
सन
1977
द्वारा निकाला गया
उ०प्र० अधिनियम सं०
12
सन 1994
द्वारा प्रतिस्थापित
उ०प्र० अधिनियम सं०
21
सन
1964
की
द्वारा
5
द्वारा बढायी गयी
उ०प्र० अधिनियम सं०
26
सन 1995
द्वारा शब्द प्रत्येक नगर के स्थान पर रखा गया
उ०प्र० अधिनियम सं० 12 सन 1994
द्वारा निकाली गयी
उ०प्र० अधिनियम सं०
26
सन
1995
द्वारा प्रतिस्थापित
उ०प्र० अधिनियम सं०
26
सन
1995
द्वारा
15
दिन के स्थान पर प्रतिस्थापित
उ०प्र० अधिनियम सं०
26
सन
1995
द्वारा उपधारा (1-क) बढायी गई
उ०प्र० अधिनियम सं०
12
सन 1994
द्वारा निकाली गई
उ०प्र० अधिनियम सं०
12
सन
1994
द्वारा प्रतिस्थापित
उ०प्र० अधिनियम सं० 35 सन 1978
द्वारा प्रतिस्थापित
उ०प्र० अधिनियम सं०
35
सन
1978
द्वारा प्रतिस्थापित
उ०प्र० अधिनियम सं०
35
सन
1978
द्वारा प्रतिस्थापित
उ०प्र० अधिनियम सं०
35
सन
1994
द्वारा प्रतिस्थापित
उ०प्र० अधिनियम सं०
26
सन
1995
द्वारा द्वारा
39
प्रतिस्थापित
उ०प्र० अधिनियम सं०
12
सन
1994
द्वारा प्रतिस्थापित
उ०प्र० अधिनियम सं०
26
सन
1995
द्वारा शब्दों राज्य
निर्वाचन आयोग के स्थान पर
प्रतिस्थापित किया गया।
उ०प्र० अधिनियम सं०
12
सन
1994
द्वारा निकाला गया
उ०प्र० अधिनियम सं०
12
सन
1994
द्वारा निकाला गया
उ०प्र० अधिनियम सं०
12
सन
1994
द्वारा प्रतिस्थापित
उ०प्र० अधिनियम सं०
26
सन 1995
द्वारा मूल अधिनियम की
द्वारा 45
को उसकी उपधारा
(1) के रूप में पुनः संख्यांकित किया गया
उपरोक्त अधिनियम के
द्वारा पुनः संख्यांकित उपधारा
(1) के पश्चात (2)
बढा दी गई
उ०प्र० अधिनियम सं०
12
सन 1977
द्वारा शब्द विशिष्ट सदस्य और निकाल दिये गये
उ०प्र० अधिनियम सं०
12
सन
1994
द्वारा निकाला गया
उ०प्र० अधिनियम सं०
12
सन 1994
द्वारा शब्दो कक्षों में जहाँ अनुसूचित जातियों
के लिये स्थान सुरक्षित हैं,
निर्वाचनों के लिये विशेष
प्रक्रिया निकाला गया।
उ०प्र० अधिनियम सं०
12
सन
1977
द्वारा निकाल दिया गया
उ०प्र० अधिनियम सं०
12
सन
1994
द्वारा निकाल दिया गया
उ०प्र० अधिनियम सं०
35
सन
1978
द्वारा प्रतिस्थापिता
उ०प्र० अधिनियम सं०
26
सन
1995
द्वारा अंक
135-क बढाया गया
उ०प्र० अधिनियम सं०
26
सन 1995
द्वारा शब्दों राज्य
निर्वाचन आयोग के स्थान पर
प्रतिस्थापित
उ०प्र० अधिनियम सं०
12 सन 1994
द्वारा प्रतिस्थापित
उ०प्र० अधिनियम सं०
35 सन 1978 द्वारा बढाया गया
उ०प्र० अधिनियम सं०
35
सन
1978
द्वारा बढाया गया
उ०प्र० अधिनियम सं०
26
सन 1978
द्वारा प्रतिस्थापित
उ०प्र० अधिनियम सं०
35
सन
1978
द्वारा प्रतिस्थापित
उ०प्र० अधिनियम सं०
12
सन 1994
द्वारा प्रतिस्थापित
उ०प्र० अधिनियम सं०
7
द्वारा उपधारा (2-क) अन्तःस्थापित
(1-10-1999
से प्रभावी)
उ०प्र० अधिनियम सं०
41
सन
1976
द्वारा शब्द उपनगर प्रमुख के स्थान पर रखा गया
उ०प्र० अधिनियम सं०
12
सन
1977
द्वारा शब्द और विशिष्ट सदस्यों निकाले गये
उ०प्र० अधिनियम सं०
12
सन
1994
द्वारा शब्द महापालिका के स्थान पर
प्रतिस्थापित।
उ०प्र० अधिनियम सं०
12
सन 1977
द्वारा शब्द विशिष्ट सदस्यों तथा निकाले गये
उ०प्र० अधिनियम सं०
12
सन 1994
द्वारा शब्द महापालिका के स्थान पर
प्रतिस्थापित
उ०प्र० अधिनियम सं०
12
सन
1994
द्वारा प्रतिस्थापित।
उ०प्र० अधिनियम सं०
12
सन 1994
द्वारा द्वारा
57-क जोड़ी गयी
उ०प्र० अधिनियम सं०
12
सन
1994
द्वारा प्रतिस्थापित
उ०प्र० अधिनियम सं०
26
सन
1995
द्वारा प्रतिस्थापित
उ०प्र० अधिनियम सं०
26
सन 1995
द्वारा अन्तःस्थापित
उ०प्र० अधिनियम सं०
12
सन 1994
द्वारा अन्तःस्थापित
उ०प्र० अधिनियम सं०
17 सन
1982 द्वारा शब्द उपनगर प्रमुख के स्थान पर रखा गया।
उ०प्र० अधिनियम सं०
17
सन
1994
द्वारा प्रतिस्थापित
उ०प्र० अधिनियम सं०
12
सन 1994
द्वारा शब्द विशिष्ट सदस्य अथवा निकाले गए
उ०प्र० अधिनियम सं०
12
सन
1977
द्वारा प्रतिस्थापित
उ०प्र० अधिनियम सं० 12 सन 1977
द्वारा शब्द विशिष्ट सदस्य अथवा निकाले गये।
उ०प्र० अधिनियम सं० 12 सन 1977
द्वारा शब्द विशिष्ट सदस्य अथवा निकाल दिये गये।
उ०प्र० अधिनियम सं० 12 सन 1994
द्वारा शब्द महापालिका के स्थान पर प्रतिस्थापित किया गया
उ०प्र० अधिनियम सं०
12 सन 1977
द्वारा शब्द विशिष्ट सदस्य निकाले गये।
उ०प्र० अधिनियम सं०
12 सन
1977द्वारा शब्द विशिष्ट सदस्य निकाल दिये गये
उ०प्र० अधिनियम सं०
12 सन
1994 द्वारा प्रतिस्थापित
उ०प्र० अधिनियम सं०
12 सन
1994 द्वारा द्वारा
84 निकाल दी गयी
उ०प्र० अधिनियम सं०
21 सन
1964 द्वारा प्रतिस्थापित
उ०प्र० अधिनियम सं० 12 सन 1977
द्वारा शब्द अथवा विशिष्ट सदस्य निकाले गये
उ०प्र० अधिनियम सं०
12 सन
1964 की द्वारा
9(2) द्वारा बढायी गई
उ०प्र० अधिनियम सं० 12 सन 1964
द्वारा प्रतिस्थापित
उ०प्र० अधिनियम सं०
26 सन
1965 द्वारा शब्द अथवा द्वारा
539 निकाल दिये गये।
उ०प्र० अधिनियम सं०
12 सन
1977 की द्वारा
23(ख)(एक) द्वारा शब्द सभासदों और विशिष्ट सदस्यों की जगह
रखे गये।
उ०प्र० अधिनियम सं०
12 सन
1977 की द्वारा
23(ख)(दो) द्वारा शब्द और विशिष्ट सदस्यों निकाले गये।
उ०प्र० अधिनियम सं०
12 सन
1977 की द्वारा
23(ग) द्वारा शब्द या विशिष्ट सदन निकाले गये
उ०प्र० अधिनियम सं० 12 सन 1977
द्वारा शब्द विशिष्ट सदस्य निकाल दिये गये
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